ताज़ा खबर
 

चौपालः फोन का खेल

पहले खेल के मैदान बच्चों की किलकारियों से गूंजते थे। दौड़ते-भागते बच्चे उन मैदानों की शोभा बढ़ाते थे। लेकिन आज मैदानी खेलों की जगह ऑनलाइन खेलों ने ले ली है।

बच्चे हों या बड़े, ज्यादातर समय स्मार्टफोन पर ‘ऑनलाइन गेम’ खेलने में बिता देते हैं।

फोन का खेल

पहले खेल के मैदान बच्चों की किलकारियों से गूंजते थे। दौड़ते-भागते बच्चे उन मैदानों की शोभा बढ़ाते थे। लेकिन आज मैदानी खेलों की जगह ऑनलाइन खेलों ने ले ली है। बच्चे हों या बड़े, ज्यादातर समय स्मार्टफोन पर ‘ऑनलाइन गेम’ खेलने में बिता देते हैं। वे खुद दौड़ने की बजाय अपनी उंगलियों को दौड़ा रहे हैं। ज्यादा समय स्मार्टफोन में गेम खेलने से बच्चों का मानसिक विकास उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा।

ऐसा माना जाता है कि मैदान वाले खेल खेलने से बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास तेजी से होता है। साथ ही, सबके साथ मिल-जुल कर रहने की भावना भी उनमें पनपती है। लेकिन आज ज्यादा समय स्मार्टफोन के साथ बिताने से बच्चे सबका साथ पसंद नहीं करते, वे अकेला रहना पसंद करते हैं। शायद इसी वजह से पहले के बच्चे ज्यादा शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा मजबूत होते थे। उन्हें तनाव का ज्यादा शिकार नहीं होना पड़ा। लेकिन आज तो हर छोटा बच्चा कहीं न कहीं किसी तनाव से ग्रस्त रहता है।

आंचल मिश्रा, कानपुर

आखिर कब

आज देश के कई हिस्से सूखे की चपेट में हैं। इस बार मानसून में बारिश तो सामान्य हुई मगर उसके वितरण में भारी असमानता देखी जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति ने अपना भयावह रूप दिखाना शुरू कर दिया है। राजस्थान कम बारिश के लिए जाना जाता है लेकिन वहां 26-27 फीसद अधिक वर्षा हुई है। दूसरी तरफ पूर्वोत्तर में इस साल 35 फीसद बारिश की कमी देखी गई है। आलम यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और हरियाणा जैसे राज्यों में सामान्य से 48 फीसद तक कम बारिश हुई है जो कि चिंता का विषय बन चुकी है। जहां एक तरफ देश के कुछ इलाके सूखे की मार झेल रहे हैं तो दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में अधिक बारिश होने के कारण भारी तबाही भी हुई है। इन इलाकों में सौराष्ट्र, मराठवाड़ा, समूचा राजस्थान शामिल है।

आखिर इस विनाशकारी परिवर्तन का जिम्मेदार कौन है? प्रकृति या फिर इंसान? लोगों ने अपने लालच की खातिर प्रकृति का इस तरह दोहन किया है और करते जा रहे हैं कि प्रकृति में भी भीषण बदलाव देखने को मिल रहा है। हमारे देश में लगभग 70 फीसद लोग कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर करती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन से देश को कितना बड़ा नुकसान होने वाला है। देश के अन्नदाता के बारे में जरा सोचिए! प्रदूषण फैलाने में उनका कोई बड़ा योगदान नहीं है मगर इसका सीधा असर उनकी फसलों पर पड़ रहा है। प्रकृति से खिलवाड़ के खिलाफ आखिर हम कब गंभीर होंगे?

पीयूष कुमार, नई दिल्ली

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 चौपालः बुजुर्गों की खातिर
2 चौपालः हमारा पानी
3 चौपाल: सूचना से खौफ
ये पढ़ा क्या?
X