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चौपालः बुजुर्गों की खातिर

बुजुर्ग माता-पिता या अभिभावकों की देखभाल करना बच्चों की कानूनी जिम्मेदारी होती है। कानून के मुताबिक ऐसे बुजुर्ग जिनकी उम्र साठ साल से ज्यादा है और अपनी देखभाल नहीं कर सकते, वे अपने बच्चों से गुजारा भत्ता मांग सकते हैं।

Author July 23, 2018 4:00 AM
अकसर देखा जाता है कि संपत्ति मिलने के बाद बेटे व बहुएं मां-बाप की देखभाल करना बंद कर देते हैं और मां-बाप की जिंदगी बहुत कठिन हो जाती है।

बुजुर्गों की खातिर

बुजुर्ग माता-पिता या अभिभावकों की देखभाल करना बच्चों की कानूनी जिम्मेदारी होती है। कानून के मुताबिक ऐसे बुजुर्ग जिनकी उम्र साठ साल से ज्यादा है और अपनी देखभाल नहीं कर सकते, वे अपने बच्चों से गुजारा भत्ता मांग सकते हैं। यदि बच्चे कानून का पालन नहीं करते तो उन्हें तीन महीने की सजा हो सकती है। इसके साथ-साथ एक और फैसला बुजुर्ग पेरेंट्स के हक में आया है। मुंबई हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है कि अगर कोई बेटा अपने बुजुर्ग मां-बाप की ठीक से देखभाल नहीं करता या उन्हें सताता है तो वे उसे दी गई संपत्ति वापस ले सकते हैं।

अकसर देखा जाता है कि संपत्ति मिलने के बाद बेटे व बहुएं मां-बाप की देखभाल करना बंद कर देते हैं और मां-बाप की जिंदगी बहुत कठिन हो जाती है। ऐसे में इस नए कानून के द्वारा मां-बाप अब अपनी संपत्ति वापस ले सकते हैं। इससे बुजुर्ग मां-बाप को एक नई ताकत मिलेगी। बच्चों द्वारा उनकी अनदेखी करना अब आसान नहीं होगी।

बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

नीति पर अमल

किसी भी ताप विद्युत परियोजना का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा उससे निकलने वाली कोयले की राख अर्थात फ्लाई ऐश की निपटान प्रणाली की मौजूदगी होती है। सामान्यतया ताप विद्युत संयंत्र से निकलने वाली राख को संयंत्र के निकटम स्थल पर तटबंध घेर कर जमा किया जाता है। ऐसे डैम के भर जाने पर आसपास की जमीन को औने-पौने दाम पर जबरिया अधिग्रहीत कर क्षेत्रफल को बढ़ा दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सैकड़ों एकड़ कृषि योग्य उपजाऊ भूमि ‘ऐश डैम’ में बदल जाती है। उसभूमि के मालिक रहे अधिकांश कृषक बेरोजगार घूमते नजर आते हैं। ऐश डैम में जमा राख के कण बहुत बारीक व हल्के होते हैं यही कारण है कि जरा-सी हवा चलने पर निकटम आबादी वाले क्षेत्र में छा जाते हैं। सांस के माध्यम से जीव जंतुओं के शरीर में प्रवेश कर गंभीर बीमारियां उत्पन्न करते हैं। ये बारीक कण पौधों के पत्तों पर जम कर उन पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कई बार डैम भर जाने अथवा अधिक बारिश होने पर राख निकटम जल स्रोतों तक पहुच कर उन्हें दूषित करती है। वह जल किसी के पीने योग्य नहीं रह जाता। उससे मिट्टी की उर्वरता घटती है।

इन समस्याओं को देखते हुए राख के समुचित निपटान और उपयोग के लिए 2015 में केंद्र की सरकार ने फ्लाई ऐश नीति बनाई थी। इस नीति के तहत ताप विद्युत् संयंत्र से निकली राख का संयंत्र के 300 किलोमीटर की परिधि में विभिन्न कार्यों में उपयोग किए जाने को बढ़ावा देने की बात कही गई है। निजी संयंत्रों के विषय में यह दायरा 500 किलोमीटर है। इस नीति के दायरे में आने वाले क्षेत्र में राख आधारित निर्माण सामग्री की उत्पादन इकाई की स्थापना में सहायता देने का प्रावधान है। सड़कों के निर्माण में राख का उपयोग किया जाना है। लेकिन कहीं भी इस नीति के अनुरूप कार्य होता नहीं दिखाई दे रहा। महज खाना पूर्ति के लिए कुछ स्थानों पर औपचारिकता निभा दी रही है। सबके लिए आवास की सबसे बड़ी योजना के तहत धड़ल्ले से पकी हुई लाल र्इंटों का प्रयोग किया जा रहा है। इसके लिए सैंकड़ों टन लकड़ी जलाई जा रही है। इन पर कार्रवाई करने के लिए सक्षम मशीनरी कमी देखी जा रही है। ऐसी गतिविधियों पर तत्काल कड़ाई से लगाम लगाते हुए फ्लाई ऐश नीति को जमीनी स्तर पर मजबूती के साथ अमल में लाए जाने की जरूरत है।

ऋषभ देव पांडेय, जशपुर, छत्तीसगढ़

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