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अगर सच्चाई की जीत होती तो फिर नादिरशाह, तैमूर लंग और चंगेज खान कैसे जीते?

भीड़ अगर साथ देती तो माइकल सर्वेंट्स, गिओदार्नो ब्रूनो, सर थॉमस मोर और एन्तोइन लारेंट लैवोजिए को कोई कैसे मार सकता था!

Author Published on: May 17, 2017 6:19 AM
proposal to change history, Maharana Pratap history, Rajasthan University, Maharana Pratap history chnages, rajasthan government changes history, महाराणा प्रताप का इतिहास, वसुंधरा राजे सरकारराजस्थान की धरती पर 1576 ई. में हल्दीघाटी युद्ध हुआ था। ( सांकेतिक फोटो)

कांटे से कांटा
समझ नहीं आ रहा कि कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाने में केंद्र सरकार देर क्यों कर रही है! पिछले दो वर्षों के दौरान घाटी में हालात सुधरे नहीं, बदतर ही हुए हैं। हर दिन कोई न कोई अनहोनी घटना हो रही है। स्थिति को यदि तुरंत नियंत्रण में नहीं किया गया तो हालात बेकाबू होने की पूरी आशंका है। उचित कदम तो यह रहेगा कि प्रदेश सरकार को भंग करके घाटी को सेना के हवाले कर दिया जाए। कांटा कांटे से ही निकलता है।
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

सच का सामना
भीड़ को देख कर सही-गलत का फैसला करने वाले लोग गलत होते हैं क्योंकि भीड़ न तो सुकरात के साथ थी और न गैलीलियो गैलिली के साथ। भीड़ अगर साथ देती तो माइकल सर्वेंट्स, गिओदार्नो ब्रूनो, सर थॉमस मोर और एन्तोइन लारेंट लैवोजिए को कोई कैसे मार सकता था!
‘सच्चाई की जीत होती है’ यह बेहूदा बात न जाने किसने फैलाई? दरअसल, जो जीतता है, सच्चाई उसके साथ खड़ी हो जाती है। अगर सच्चाई की जीत होती तो फिर नादिरशाह, तैमूर लंग और चंगेज खान कैसे जीते? गौरी और गजनवी ने हमें क्यों रौंदा? बेहूदा बातें जिम्मेदारी से बचने का तरीका सुझाती हैं और कुछ नहीं। सैकड़ों साल की गुलामी के बाद तो हमें अक्ल का इस्तेमाल करना चाहिए।
एक और बेहूदा बात हमारे यहां अक्सर बोली जाती है- ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो जाएगा; बस एक बार जांच पूरी हो जाने दीजिए! कहने वाले यह भी जानते हैं कि ‘दूध-पानी’ का मिलन कोई नेताओं का मिलन नहीं है जो मौका मिलते ही एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने लगते हैं। यह मिलन तो चिरस्थायी होता है। वैसे भी वे हंस अब नहीं हैं जो नीर-क्षीर विवेकी होते थे!
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

सराहनीय कदम
उच्चतम न्यायालय के सभी न्यायाधीशों ने गर्मियों की छुट्टियों में भी देशहित और समाज के लिए काम करने का फैसला लिया है। यह एक सराहनीय कदम है। उन प्रशासनिक स्तर पर कार्यरत सभी व्यक्तियों को इनसे सीख लेने की आवश्यकता है जो सरकारी पदों पर आसीन होने के बाद अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकतों की वजह से लगातार सुर्खियों में आते रहते हैं। हमें अपनी सोच को बदलने की जरूरत है। कोई भी प्रशासनिक व्यवस्था जनता के लिए होती है। आज के दौर में प्रशासन में किसी भी पद पर नियुक्ति के लिए लोग लालायितरहते हैं। वजह, वहां आराम ज्यादा है। सभी व्यक्तियों को इस मानसिकता से आगे बढ़ कर सर्वजनहिताय, सर्वजन सुखाय की परिकल्पना को साकार करना होगा। उच्चतम न्यायालय की तर्ज पर सभी प्रशासनिक और गैरप्रशानिक संस्थानों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन कर सामाजिक हित को सर्वोपरि मान कर कार्य करने की जरूरत है।
’धीरज चतुर्वेदी, सतना, मध्यप्रदेश

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