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चौपाल: प्रदूषण का दायरा

ध्वनि प्रदूषण भी कुछ लोगों, खासतौर बीमार लोगों के लिए मुसीबत बनता है। यह प्रदूषण भी कई बीमारियों की जड़ है। इसके कारण मनुष्य को मानसिक और शारीरिक विकार का भी खतरा होता है।

Author November 7, 2018 2:36 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अपनी कुछ समय की खुशी के लिए दूसरों को परेशानी देना या वातावरण को नुकसान पहुंचाना उचित नहीं। सबकी अपनी-अपनी सोच होती है कि वह किस बात को किस नजरिए से देखता है। इस दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों से फैलने वाले वायु प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए दिवाली में पटाखे चलाने की समय सीमा तय कर दी है। दरअसल, दिवाली पर भारी मात्रा में जलाए जाने वाले पटाखे वायु प्रदूषण ही नहीं फैलाते, बल्कि बहुत ज्यादा ध्वनि प्रदूषण भी करते हैं। ध्वनि प्रदूषण भी कुछ लोगों, खासतौर बीमार लोगों के लिए मुसीबत बनता है। यह प्रदूषण भी कई बीमारियों की जड़ है। इसके कारण मनुष्य को मानसिक और शारीरिक विकार का भी खतरा होता है। यह जीव-जंतुओं पर भी नकारात्मक असर डालता है। माना कि दिवाली पर एक या दो दिन पटाखे न चलाने से ही न तो वायु प्रदूषण कम होने वाला और न ही ध्वनि प्रदूषण, लेकिन हर तरह का प्रदूषण जिस तरह जीव-जगत के लिए घातक बनता जा रहा है, उसमें उन कार्यों पर भी नियंत्रण करना जरूरी है जो किसी भी तरह के प्रदूषण को बढ़ाते हैं।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

वोट की कीमत
चुनाव के पहले राजनीतिक दलों का बाजार सज जाता है, जिसमें येन-केन-प्रकारेण और साम-दाम, दंड-भेद जैसी तमाम नीतियों से मतदाता का वोट, ईमान और प्रत्याशी का टिकट खरीदने-बेचने की कोशिश की जाती है। इस बाजार में सबके न्यूनतम या अधिकतम मूल्य तय होते हैं। टिकट के लिए दल-बदल भी एक प्रकार का ईमान बेचना है। विरासती महानता और विश्व-गुरु होने का गान करने वाले देश में सभी को कर्जमाफी के लिए कर्ज, बिना काम वेतन, रोजगार के स्थान पर भत्ता, बिना मेहनत मुफ्त में सब कुछ प्राप्त होना चाहिए। इस हम्माम में सभी नंगे हैं। इस माहौल में अगर किसी को कहें कि ‘मत बिको’ तो कोई नहीं सुनेगा। इसलिए लीक के विपरीत बात है कि अगर मजबूरी हो तो वोट की कीमत जो भी मिले, एक या अनेक, सभी से ले लें, लेकिन वोट देते समय अपने विवेक, बुद्धि, ज्ञान राष्ट्रहित और देश-प्रदेश का भविष्य जिसके हाथों सुरक्षित है, उसे ध्यान रखते हुए सर्वोत्तम-सुयोग्य प्रत्याशी को ही अपना प्रतिनिधि चुनें। बेईमान, दागी, भ्रष्टाचारी राजनीतिक दलों को थोड़ा सबक सिखाना जरूरी है।
राधेश्याम ताम्रकर, इंदौर, मप्र

अतीत से आगे
आज हर कोई इस मुद्दे पर चर्चा कर रहा है कि अयोध्या में मंदिर बनना चाहिए या मस्जिद। लेकिन अयोध्या में मंदिर या मस्जिद बनाने की जरूरत क्या है! हम बोलते हैं कि भगवान और अल्लाह हर जगह है, हर इंसान में है। फिर किसी खास जगह में हम भगवान को क्यों बांध कर देखना चाहते हैं? अयोध्या में जो हुआ, वह गलत हुआ। लेकिन अब क्यों नहीं इस जगह को छोड़ दिया जाए और जब जरूरत हो तब उसका उपयोग जनहित या जनता की उपयोगिता के लिए किया जाए। आज इस देश में नदियों और हवा की हालत इतनी खराब हो चुकी है, कहीं सूखा है तो कहीं अतिवृष्टि, शिक्षा और रोजगार की स्थिति चिंताजनक है। यह सब समस्याएं धर्म की लड़ाई या मंदिर-मस्जिद बनने से नहीं सुलझेंगीं। लेकिन हमारा देश धर्मों के महंथों के झगड़े में उलझा हुआ है। आजादी की लड़ाई में जैसे हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई साथ मिल कर लड़े, आज वह समय आ गया है कि हम अपने लिए जरूरी मुद्दों पर अपनी आवाज उठाएं। तनाव बढ़ाने वाले बेमानी मुद्दों पर लड़ने से सबका केवल नुकसान ही होगा।
’ऋचा, मुंबई

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