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विकास का रास्ता

गरीब आदमी इसी तरह फटे-पुराने कपड़ों की मरम्मत करके काम चलाता है, मगर क्या सड़कों के भी सिर्फ गड््ढों को भरने से काम चल सकता है? बरसात में फिर वही हाल हो जाता है।

Author October 23, 2017 05:38 am
लखनऊ से हरदोई में प्रवेश के बाद भीतर जाने पर ऐसी सड़कें मिलती हैं। (Source: Jansatta Online)

हर साल बरसात के बाद देश भर की सड़कों में छोटे-बड़े गड््ढे हो जाते हैं। उन्हें देख कर तय करना मुश्किल हो जाता है कि सड़कों में गड््ढे हैं या गड््ढों में सड़कें हैं! सरकारें कांग्रेस की हों या भाजपा की, केंद्र की हों या राज्यों की, टूटी-फूटी सड़कों को नए सिरे से मुकम्मल तौर पर नहीं बनवातीं बल्कि गड््ढों की मरहम-पट्टी कराती हैं जैसे फटे हुए कपड़ों में पैबंद लगा दिया जाता है या उन्हें रफू कर दिया जाता है। गरीब आदमी इसी तरह फटे-पुराने कपड़ों की मरम्मत करके काम चलाता है, मगर क्या सड़कों के भी सिर्फ गड््ढों को भरने से काम चल सकता है? बरसात में फिर वही हाल हो जाता है। देश में बहुत कम सड़कें हैं जिन्हें दुबारा तोड़ कर नए सिरे से बनाया जाता है, ज्यादातर जगहों पर तो गड््ढों में केवल बजरी, तारकोल या सीमेंट भर देते हैं। ऐसी सड़कों पर चलना बहुत मुश्किल है। गांव-कस्बों में तो बुरा हाल है ही, राजधानी दिल्ली में भी बहुत-सी सड़कों के सिर्फ गड््ढों को भर दिया जाता है। उन पर गाड़ी, साइकिल, बाइक, रिक्शा आदि उछल-उछल कर चलते हैं जिससे पेट की नाब उतर जाती है। छोटे-छोटे बच्चों, बूढ़ों और बीमार लोगों को इससे सफर में काफी परेशानी होती है। यातायात भी रुक-रुक कर चलता है। ऐसी सड़कों पर सालों तक ये गड््ढे यों ही पड़े रहते हैं। बस चुनाव के दिनों में इनकी अस्थायी मरम्मत कर दी जाती है।

क्या इस अधूरे काम को विकास कहा जा सकता है? बुलेट ट्रेन बाद में आती, पहले इन गांव-कस्बों-शहरों की सड़कें तो ढंग से बन जातीं! इस नए दौर में भी टूटी-फूटी सड़कों पर चलते हुए ऐसा लगता है मानो बैलगाड़ी या घोड़ा तांगे में सफर कर रहे हैं। इतने बड़े हिंदुस्तान में चंद शहरों की तरक्की करना और बाकी गांव-कस्बों को यों ही छोड़ देना क्या गैरबराबरी नहीं है? क्या छोटे गांव-कस्बे विकास के हकदार नहीं हैं? वहां न शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के संस्थान हैं और न अस्पताल, फैक्ट्री, कारखाने या बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं। यही कारण है कि पिछले साठ साल से लोग लगातार तेजी से महानगरों में आते जा रहे हैं। महानगरों में बहुत बुरा हाल हो गया है। कहीं कोई जगह खाली नहीं है। नगरीकरण की समस्या बढ़ती जा रही है और पानी, आवास की भी। कौन जिम्मेवार है ऐसी स्थिति के लिए? ‘सबका साथ सबका विकास’ सिर्फ कहने के लिए है। गिने-चुने शहरों का ही विकास किया जा रहा है। कहीं तो जन्नत बनाने में लगे हैं और कहीं दोजख से भी बुरा हाल है। तरक्कीयाफ्ता होने का अधिकार तो सबको है!
’मेहजबीं, नई दिल्ली
बाधाओं के पार
कुछ दिन पहले दिल्ली में एक नाइजीरियाई युवक को हाथ-पैर बांध कर बुरी तरह पीटे जाने का वीडियो सामने आया। उस युवक पर चोरी का आरोप था। कानून अपने हाथ लेकर भीड़ के खुद ही न्यायाधीश बनकर बिना जांच के सजा देने का यह कोई नया मामला नहीं है। इस बार इसका शिकार एक विदेशी नागरिक बना। इस मामले में पुलिस का रवैया हैरत में डालने वाला रहा जिसने भीड़ की करतूत को नजरअंदाज करते हुए उलटे युवक के खिलाफ ही मामला दर्ज करने में देर नहीं लगाई। ‘अतिथि देवो भव:’ की संस्कृति वाले हमारे देश में एक विदेशी युवक के साथ ऐसा कृत्य क्या बताता है?

यदि कोई विदेशी नागरिक किसी अपराध में लिप्त है तो भारतीय कानून को काम करने देना चाहिए। वर्षों तक अंग्रेजों के नस्ली भेदभाव का शिकार रहे भारत पर कभी स्वयं किसी के साथ नस्ली भेदभाव के आरोप नहीं लगे। लेकिन इस तरह कुछ देशों के अश्वेत नागरिकों पर हो रहे हमले अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में हमारी छवि पर बट्टा लगा रहे हैं। हमारे देश में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले भी लगातार सामने आते हैं। मानव विकास सूचकांक में हम श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों से भी पीछे 131वें पायदान पर खड़े हैं। ये चुनौतीपूर्ण अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण पूर्व एशिया से वैश्विक नेता के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे भारत के रास्ते की बहुत बड़ी बाधाएं हैं। इन बाधाओं को पार करना बेहद जरूरी है। इसके लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। सरकारी मशीनरी को निष्पक्षता और जवाबदेही के साथ काम करना होगा। देश को आगे बढ़ाने के लिए आम जन को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
’ऋषभ देव पांडेय, जशपुर, छत्तीसगढ़

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