ताज़ा खबर
 

बत्ती गुल, कब तक

एक लंबे अरसे से वीआईपी संस्कृति को समाप्त किए जाने की मांग की जा रही है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी वीआईपी कल्चर की प्रतीक लाल बत्ती के प्रयोग को सीमित करने की बात कही थी।

Author April 26, 2017 4:51 AM
लाल बत्ती वाली कार

बत्ती गुल

नरेंद्र मोदी सरकार के नए निर्देश के अनुसार 1 मई 2017 से केंद्र और राज्य सरकार का कोई भी नेता या अधिकारी अपने वाहन पर लाल या अन्य किसी रंग की बत्ती का प्रयोग नहीं कर पाएगा। अब केवल आपातकालीन सेवाओं के लिए नीली बत्ती का प्रयोग किया जा सकेगा। एक लंबे अरसे से वीआईपी संस्कृति को समाप्त किए जाने की मांग की जा रही है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी वीआईपी कल्चर की प्रतीक लाल बत्ती के प्रयोग को सीमित करने की बात कही थी।

गौरतलब है कि भारत में लाल बत्ती का आशय किसी के शक्तिशाली, पहुंच वाला, बड़ा नेता या अधिकारी होने से लगाया जाता रहा है जिनके जरिए किसी भी प्रकार का काम चुटकियों में करा लेना मुमकिन होता है, चाहे वह अनैतिक या गैर-कानूनी ही क्यों न हो। इस तरह के प्रतीकात्मक चिह्न समाज में असमानता उत्पन्न करते हैं। यह असमानता कई प्रकार की हो सकती है जैसे कि मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि। भारत में कई बार लोग नेता या अधिकारी बनने का ख्वाब सिर्फ इसलिए देखते हैं कि उन्हें लाल बत्ती लगी गाड़ी का प्रयोग करने को मिलेगी। यदि विश्व के अन्य कुछ देशों की बात की जाए तो वीआईपी कल्चर समाप्त करने के प्रयास होते रहे हैं। ऐसे देशों की कड़ी में पहले तीन स्थानों पर स्वीडन, नार्वे, स्विट्जरलैंड आते हैं। यहां अक्सर बड़े नेता भी अपनी कार खुद चलाते हैं। इन देशों में उन कृत्रिम प्रतीकों को लगभग समाप्त किया जा चुका है जो समाज के भीतर असमानता को जन्म देते हैं। हालांकि केंद्र सरकार से पहले लाल बत्ती की गाड़ी के प्रयोग पर रोक कुछ अन्य राज्यों के साथ ही नव गठित पंजाब सरकार भी लगा चुकी है। यदि पूर्ण रूप से लाल बत्ती के प्रयोग को समाप्त कर लिया जाता है तो यह तथाकथित बड़े और वीआईपी होने का दंभ भरने वालों के लिए बुरी खबर है।

’श्यामवीर सिंह झझोरिया, गांधी विहार, दिल्ली

कब तक
देश के अनेक भागों में नक्सलवाद अपने पैर पसारता ही जा रहा है। रोज किसी न किसी क्षेत्र में हमारे जवान नक्सलियों की हिंसा का शिकार होते हैं लेकिन सुर्खियों में खबर तब आती है जब कोई बड़ा हमला होता है। इसी का ताजा उदाहरण है सुकमा में सीआरपीएफ के 26 जवानों की कुर्बानी। केंद्र सरकार और प्रभावित राज्यों की सरकारें नक्सलवाद समाप्त करने की बात कहती हैं तो वह समाप्त क्यों नहीं हो रहा? जब सुरक्षा बल देश की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध हैं तो नक्सलवाद और आतंकवाद पर रोक क्यों नहीं? कब तक हमारे जवान शहीद होते रहेंगे?
’यश वीर आर्य, देहरादून

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App