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किसके लिए चुनाव

आए दिनों एक से एक खबर मिलती रहती है चुनाव के समय और हम सभी उसको देखते हैं। चुनाव का नाम खराब करने का हक किसी को नहीं दिया गया है। जरा सोचिए, क्या इस तरीके का व्यवहार चुनाव के लिए सही है?

stateसांकेतिक फोटो।

ज्यों-ज्यों चुनाव का सही वक्त आने को होता है तो आमतौर पर नफरत, हिंसा और तबाही की व्यूह रचना के तहत लोगों की भावना को प्रभावित किया जाने लगता है। चुनाव आते ही चारों तरफ एक तरह का तनाव का माहौल बन जाता है। इसमें सुविधाप्राप्त वर्गों पर तो बड़ा असर नहीं पड़ता है, लेकिन इसमें गरीबों का कोई कसूर नहीं होने के बावजूद पिसते सिर्फ वही हैं। उनके लिए दोनों तरफ का चुनाव समान लगता है। आए दिनों एक से एक खबर मिलती रहती है चुनाव के समय और हम सभी उसको देखते हैं। चुनाव का नाम खराब करने का हक किसी को नहीं दिया गया है। जरा सोचिए, क्या इस तरीके का व्यवहार चुनाव के लिए सही है? चुनावों के दौरान जो वादे किए जाते हैं, उनसे आम जनता का कितना हित सुनिश्चित हो पाता है?
’सृष्टि मौर्य, फरीदाबाद, हरियाणा

उपेक्षा की अति
‘उनहत्तर साल बाद’ (संपादकीय, 8 अप्रैल) हमारे देश के प्रशासन तंत्र पर इस प्रकार का साया छा जाएगा, यह कोई भी नहीं सोच सकता। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की पारूली देवी के साथ जिस तरह की घटना हुई, उससे ऐसा लगता है कि समूचा तंत्र नींद में रहता है। रक्षा विभाग के अधिकारियों के रहते एक फौजी की मौत के बाद उसकी पत्नी की ऐसी उपेक्षा की गई, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपना लंबा समय व्यतीत करने के बाद और 69 साल बाद पारूली देवी को एक सामाजिक कार्यकर्ता की मदद से अपना हक मिला।
यह इतनी बड़ी लापरवाही है, जिससे लगता है कि हमारा प्रशासनिक तंत्र बेहद लापरवाह है। लंबे संघर्ष के दौरान पारूली देवी ने आखिर अपने जीवन को किस तरह की कठिन परिस्थितियों के बीच व्यतीत किया होगा? अपने अपने परिवार के साथ किस तरह से उसके दिल पर क्या गुजरी होगी, यह पीड़ा वही जान सकती हैं। शासन तंत्र चाहता तो सभी प्रकार की औपचारिकता पूरी करते हुए उन्हें पेंशन का लाभ दिया जा सकता था। इस तरह के मामलों में जब ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती है तो हर किसी को पीड़ा होती होगी।
’विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली

लापरवाही की राह
भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर अपने चरम पर है। इस कारण पिछले कुछ दिनों से चौबीस घंटे में प्रति एक लाख से अधिक कोरोना संक्रमित मामलों की पुष्टि हो रही है। ऐसे में एहतियात के तौर पर कई राज्यों में रात का कर्फ्यू और स्थानीय स्तर पर पूर्णबंदी के विकल्प को अपनाया जा रहा है। लेकिन इस बीच चुनावी राज्यों (पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुदुचरी) में नेताओं की सभा, रोड शो में हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ को देख कर गुस्सा आ रहा है कि यह सब क्यों? इस मुश्किल समय में तो नेताओं को डिजिटल माध्यम से अपनी बात जनता तक पहुंचा कर आदर्श प्रस्तुत करना था। लेकिन बहुत शर्मनाक है भारत के बड़े और शीर्ष स्तर के नेता प्रतिदिन हजारों की भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं। क्या कोई ऐसा कानून नहीं है कि इस चलन को रोका जा सके। अदालतों की ओर से कुछ ठोस पहल होनी चाहिए।
’प्रदीप कुमार दुबे, देवास, मप्र

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