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चौपाल: शहीदों को श्रद्धांजलि

युद्ध के तुरंत बाद सरकारें शहीदों के परिजनों के लिए वायदों की झड़ी लगा देती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि समय बीतने के साथ ये कथित सरकारी वादे सरकारों को याद नहीं रहते। ऐसे में ज्यादातर शहीदों, जो इस देश के लिए अपना अमूल्य जीवन को खो देते हैं, के परिवार बहुत ही गरीबी का और दयनीय जीवन जीने पर मजबूर हो जाते हैं।

Author July 30, 2018 6:25 AM
कारगिल युद्ध के दौरान विजय की तस्वीरें…

ठीक उन्नीस वर्ष पूर्व 1999 में साठ दिन लंबा करगिल युद्ध चला था। भारत की सीमा में स्थित कारगिल नामक एक जगह पर स्थित पहाड़ की चोटी पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना के इस प्रायोजित युद्ध भारत के बहादुर जवानों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी अपनी कुशल रणनीतिक चालों से पाकिस्तानियों को धूल चटा दी थी। लेकिन इस युद्ध में भारतीय सेना के पांच सौ से ज्यादा जवानों को अपने अमूल्य जीवन की कुरबानी देनी पड़ी।

युद्ध के तुरंत बाद सरकारें शहीदों के परिजनों के लिए वायदों की झड़ी लगा देती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि समय बीतने के साथ ये कथित सरकारी वादे सरकारों को याद नहीं रहते। ऐसे में ज्यादातर शहीदों, जो इस देश के लिए अपना अमूल्य जीवन को खो देते हैं, के परिवार बहुत ही गरीबी का और दयनीय जीवन जीने पर मजबूर हो जाते हैं। ऐसे एक-दो नहीं ढेरों उदाहरण हैं। करगिल शहीदों के लिए सरकार की तरफ से यह सार्वजनिक घोषणा की गई थी कि परिवार के गुजारे के लिए कुछ कृषि जमीन सरकार उपलब्ध कराएगी। लेकिन आज तक किसी को कुछ नहीं मिला। ज्यादातर शहीदों के परिवारों की माली हालत खराब है। शहीदी पेंशन भी समय से नहीं मिलती, कभी छह महीने बाद तो कभी-कभी नौ-नौ महीने तक इंतजार करना पड़ता है।

प्रश्न यह है कि हम जिन जवानों के जीवन की कीमत पर युद्ध जीतते हैं, उन्हीं को भुला देते हैं। वास्तविकता ये है कि युद्ध में सीमा पर एकदम अगली पंक्ति में दुश्मन के सामने सदैव जवान खड़ा रहता है। हमेशा जवान ही शहीद होता है। लेकिन सेना में सबसे न्यूनतम सुविधाएं व कम वेतन जवान का ही होता है। सेना के बड़े अफसरों का जीवन हर तरह से सुविधा संपन्न और सुरक्षित होता है, तो फिर जवानों के साथ इतना पक्षपात क्यों? हर साल 26 जुलाई को राजधानी दिल्ली स्थित अमर जवान ज्योति पर रक्षा मंत्री सहित तीनों सेनाओं के सेना प्रमुखों और बड़े अफसरों के साथ करगिल में अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं। इस श्रद्धांजलि देने की औपचारिकता पूरी करने से ज्यादा जरूरी यह है कि हम यह याद रखें कि वह शहीद अपने पीछे अनाथ परिवार छोड़ गया है, उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी इस देश और इस सरकार की है। यही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

न्यूनतम समर्थन मूल्य

भारत के कृषि क्षेत्र में हर राज्य में बहुत से अंतर हैं। ये अंतर मौसम, जलवायु, भौगोलिक स्थिति, कृषि संबंधी अनुकूलताओं की वजह से हैं। लेकिन केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में जो वृद्धि तय करती है, उसका लाभ कुछ राज्य के किसानों को नहीं मिल पाता। हाल में सरकार ने खरीफ की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत का डेढ़ गुना या उससे अधिक बढ़ा दिया। इससे अब किसानों को फसल की लागत का डेढ़ गुना या इससे ज्यादा दाम मिलेगा। लेकिन केंद्र सरकार की इस योजना का लाभ दूर-दराज के गांवों के किसानों को नहीं मिलने वाला। अक्सर देखा गया है कि किसानों के लिए जो योजनाएं बनती हैं, वो भ्रष्टाचार के कारण दूर-दराज के गरीब किसानों तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। हालांकि सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने के इरादे से जो न्यूनतम मूल्य में जो वृद्धि की है, उससे बिचौलियों की भूमिका शायद ही खत्म हो और किसानों को उनकी फसल का शायद उचित मूल्य मिले। ऐसे किसानों की तादाद बहुत बड़ी है जो कर्ज में डूबे हैं। ऐसे में किसान अपनी फसल बेचने के लिए बिचौलियों के पास जाने को मजबूर होते हैं। सरकार को चाहिए कि वो किसानों को घरेलु उद्योगों से जोड़े, उन्हें उनकी फसलों से खाद्य सामान तैयार करके बाजार में बेचने के उचित प्रबंध करे।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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