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जनसत्ता चौपाल : रियो के सबक

रियो डि जिनेरियो में संपन्न खेलों के महाकुंभ इकतीसवें ओलंपिक में भारत ने एक कांस्य (कुश्ती- साक्षी मलिक) और एक रजत (बैडमिंटन- पीवी सिंधु) पदक लेकर सड़सठवां स्थान प्राप्त किया है।

Author नई दिल्ली | Published on: August 23, 2016 6:19 AM
Rio Olympic 2016 में भारत को चांदी का सिल्वर मेडल जितवाने वालीं पीवी सिंधू। (Source: Reuters)

रियो डि जिनेरियो में संपन्न खेलों के महाकुंभ इकतीसवें ओलंपिक में भारत ने एक कांस्य (कुश्ती- साक्षी मलिक) और एक रजत (बैडमिंटन- पीवी सिंधु) पदक लेकर सड़सठवां स्थान प्राप्त किया है। गौरतलब है कि पिछले लंदन ओलंपिक में देश को छह पदक मिले थे। दुनिया की 1/6 आबादी, जनसंख्या के क्रम में दूसरा नंबर, विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, 117 खिलाड़ियों का अब तक का सबसे बड़ा दल और दो वर्ष में टारगेट ओलंपिक पोडियम के तहत 180 करोड़ रुपए खर्च के बाद यह स्थिति निश्चित ही विचारणीय है और स्यापा करने के बजाय नीतिगत और व्यवहारगत पुनरीक्षण करने की आवश्यकता प्रतिपादित करती है।

ओलंपिक सहित सभी खेल प्रतियोगिताओं का उद्देश्य खेल भावना का विकास होता है और इसी के तहत विभिन्न देश अधिक से अधिक खेलों में अधिकाधिक खिलाड़ी भेजने का प्रयास करते हैं। अब जबकि ओलंपिक संपन्न हो चुके हैं और अगले टोकियो (जापान) ओलंपिक में भाग लेने की योजनाएं बनेंगी उसके पूर्व रियो ओलंपिक के अनुभवों की रोशनी में हमारी खेल नीति, व्यावहारिक स्तर की खामियों तथा खूबियों का तटस्थ विश्लेषण अवश्य करना चाहिए। खेलों के लिए हमारे देश में प्रतिव्यक्ति मात्र तीन पैसे प्रतिदिन खर्च किया जाता है। यह एक आंकड़ा ही खेल के प्रति हमारे राष्ट्रीय दृष्टिकोण को जानने के लिए काफी है। दुनिया के एक तिहाई कुपोषित हमारे देश में हैं। लगभग ऐसी ही स्थिति रक्ताल्पता की है। टीबी के सर्वाधिक पीड़ित हमारे यहां हैं। प्रति व्यक्ति खाद्यान्न, दूध और दलहन आहारकताओं में हम औसत से बहुत कम प्राप्तकर्ता हैं तो हमारे खिलाड़ियों में दमखम कैसे आएगा? सर्वप्रथम, हमें पर्याप्त दूध, दलहन व खाद्यान्न प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध कराना सुनिश्चित करना होगा। खेल को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा, खेल मैदानों को बचाना होगा और बच्चे व नौजवान खेल का चयन करियर के तौर पर करें, ऐसा वातावरण बनाना होगा।

स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक के खेल संगठनों पर नजर दौड़ाएं तो सभी जगह राजनीतिकों का कब्जा दिखाई देता है, ऐसा क्यों? हाल ही में ओलंपिक समिति में नीता अंबानी की नियुक्ति के क्या संकेत हैं? किसी क्रिकेट टीम की मालकिन होने के अलावा उनका खेलों में क्या योगदान है? खेल संगठनों व संस्थानों में पूर्व खिलाड़ी, कोच, अंपायर को ही पद नवाजे जाने चाहिए और दो से अधिक कार्यकाल की अनुमति नहीं होनी चाहिए। कारपोरेट जगत को भी समझना चाहिए कि क्रिक्रेट ही खेल का पर्याय नहीं है, अन्य खेलों को भी प्रश्रय देने के लिए उन्हें आगे आना चाहिए, खेल व खिलाड़ियों को प्रारंभिक स्तर से निरंतर ‘गोद’ लेकर उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए तैयार करने के राष्ट्रीय व सामाजिक दायित्व का निर्वहन करना चाहिए।
नरसिंह यादव डोपिंग प्रकरण ने खेल में पक्षपात, षड्यंत्र, दावपेंच के बहुतेरे पक्षों को उजागर किया है। ऐसे विवाद और प्रकरण खिलाड़ियों को कुंठित और हतोत्साहित तो करते ही हैं, राष्ट्र को भी शर्मसार करते हैं। अपने खिलाड़ियों को पक्षपात, राजनीति, षड्यंत्रों से सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित करना और स्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण निर्मित करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए।

तमाम प्रतिकूल सामाजिक परिस्थितियों, लैंगिक भेदभाव/ उत्पीड़न और खाप पंचायतों सरीखी मानसिकता के बावजूद पीवी सिंधु, साक्षी मलिक, दीपा कर्मकार, ललिता बाबर, मेरिकाम, कर्णम मल्लेश्वरी, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा, दीपिका कुमारी और फोगट बहनों जैसी सितारा खिलाड़ियों का उभरना देश-समाज के सुनहरे भविष्य के प्रति आशान्वित करता है।

सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर


बेटियों की उपलब्धि
रियो ओलंपिक से बेशक हमारी झोली में ज्यादा पदक नहीं आ पाए मगर जो सम्मान हमारी बेटियों ने मुल्क को दिलाया है उसके लिए यह देश उनका सदैव आभारी रहेगा। हम आज, कल या फिर कुछ महीनों में बेशक इन सब बातों को भूल जाएं मगर इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि बेटियां बोझ नहीं हैं। वे भी उतनी ही कीमती हैं जितने कि बेटे। सरकार को चाहिए कि वह बेटियों का हौसला बढ़ाने में कोई कसर न छोड़े ताकि भावी पीढ़ी को आगे बढ़ने में कोई दिक्कत न हो।

रोहित कुमार पाठक, बलजीत नगर, दिल्ली


बेपर्दा हकीकत
‘माई गोव’ वेब पोर्टल पर जनता से सीधे संवाद करते हुए प्रधानमंत्री ने दलितों पर बढ़ते अत्याचारों के बाबत जो कहा वह उचित और सामयिक था लेकिन उसमें जो सांप्रदायिकता की छौंक लगाई वह न उचित थी, न आवश्यक और न ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक। उन्होंने कहा कि युद्ध में बादशाह राजाओं की सेना के सामने गायों को खड़ा कर देते थे और गायों को न मार पाने के कारण राजा हार जाते थे। इस बात का कोई प्रसंग भी नहीं था और न ऐसे ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं। क्या प्रकारांतर से प्रधानमंत्री यह नहीं कह रहे हैं कि भले ही गीता हमारे देश में रची गई हो लेकिन हमारे शासकों ने उसके संदेश को बिल्कुल नहीं समझा?

इसी वार्ता में उन्होंने गोरक्षकों के बारे में जो कहा वह भी उनकी अपनी पार्टी के बारे में टिप्पणी है। उन्होंने कहा कि अस्सी फीसद गोरक्षक असामाजिक तत्त्व होते हैं। यह तथ्य तो अनाड़ी भी जानता है कि शत प्रतिशत गोरक्षकों का संबंध भाजपा से है और उनमें अगर अस्सी प्रतिशत असामाजिक तत्त्व हैं तो भाजपा में कैसे लोग भरे हैं इसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है। मुलाहजा हो, यह टिप्पणी विपक्ष की नहीं है भाइयो-बहनो, अपने आदरणीय प्रधानमंत्रीजी की है!

आनंद मालवीय, इलाहाबाद


मैकाले की लीक
देश की शिक्षा व्यवस्था आज भी लॉर्ड मैकाले द्वारा निर्धारित की गई लीक के इर्द-गिर्द ही घूमती है. जिसका नतीजा है घोर बेरोजगारी। आज देश के हालात ऐसे हो गए हैं कि यहां स्नातक और स्नातकोत्तर के बाद भी नौकरी नहीं मिलती। हम उच्च शिक्षा के लिए विदेशों का मुंह देखते हैं मगर खुद अपनी शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त नहीं करना चाहते।
आज के चुनौतियों से भरे युग में हम पुरानी शिक्षा व्यवस्था को थामे आगे नहीं बढ़ सकते। लिहाजा, सरकार को चाहिए कि शिक्षा पद्धति में सुधार करे ताकि हमारे युवाओं का भविष्य सुरक्षित हो सके। हम यदि युवा शक्ति को आगे बढ़ाने की बात करते हैं तो पहले उसे एक सुरक्षित भविष्य देना होगा।

रोहित कुमार पाठक, बलजीत नगर, दिल्ली

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