जनसत्ता चौपाल : बड़ी चुनौती

कश्मीर में एक ओर आतंकी हमलों में हमारी सेना और सुरक्षा बलों के लोग जान गंवा रहे हैं, दूसरी ओर वहां के लोग वर्षों से सेना/ सुरक्षा बलों के पहरे में हैं। भारी सैन्य जमाव के बीच जीवन जीना कोई सुखद अनुभव नहीं हो सकता भले उसकी मौजूदगी देश की सीमा और देशवासियों की रक्षा के लिए ही क्यों न हो।

Author नई दिल्ली | July 19, 2016 2:56 AM
jammu kashmir, srinagar, kashmir unrest, srinagar bunker, securuty forces, kashmir protest, hizbul militantsकर्फ्यू के वक्त श्रीनगर में खड़ा मिलिट्री का जवान। (AP Photo/Dar Yasin/File)

कश्मीर में पिछले दिनों आतंकी बुरहान वानी के सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे जाने के बाद हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन गंभीर चिंता पैदा करते हैं। कुछ माह पहले भी, जब सेना पर एक किशोरी के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगा था, वहां हिंसक झड़पें हुई थीं। इस बार दसियों हजार लोग एक आतंकी के जनाजे में शामिल हुए और हिंसा के बाद लगाए गए कर्फ्यू के बावजूद विरोध प्रदर्शन और भारत विरोधी नारे जारी रहे। अबकी बार सेना और पुलिस के साथ ही अमरनाथ यात्रियों के पैदल काफिलों और वाहनों को भी विरोध प्रदर्शन करने वाले पत्थरबाजों ने निशाना बनाया।

कश्मीर में एक ओर आतंकी हमलों में हमारी सेना और सुरक्षा बलों के लोग जान गंवा रहे हैं, दूसरी ओर वहां के लोग वर्षों से सेना/ सुरक्षा बलों के पहरे में हैं। भारी सैन्य जमाव के बीच जीवन जीना कोई सुखद अनुभव नहीं हो सकता भले उसकी मौजूदगी देश की सीमा और देशवासियों की रक्षा के लिए ही क्यों न हो। कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में सुरक्षा बलों पर विशेषाधिकार कानून की आड़ में निर्दोष नागरिकों के साथ ज्यादतियां करने के गंभीर आरोप भी बार-बार लगते रहे हैं। इनमें से कुछ झूठे-बेबुनियाद होते हैं, पर कई अरोप जांच में सही भी पाए गए हैं। मणिपुर में इरोम शर्मिला सालों से इस कानून के विरोध में भूख हड़ताल पर हैं। सबसे दुखद और चिंताजनक बात यही है कि निर्दोष नागरिक आतंकियों और सुरक्षा बलों की लड़ाई में पिस रहे हैं और उन लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हैं जिनका सुखभोग भारत के अन्य हिस्सों के नागरिक निर्बाध रूप में कर रहे हैं। यह कुछ दिन या महीनों की बात नहीं, उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा ऐसे ही निकल रहा है। इन लोगों के बारे में सोचना चाहिए।

मुझे कभी कश्मीर जाने का अवसर नहीं मिला। लेकिन वहां गए कई लोगों से मैंने सुना है कि स्थानीय लोग उनके साथ अच्छा बर्ताव करते हैं। अभी की घटना के दौरान भी ऐसी खबर आई कि अमरनाथ यात्रियों की दुर्घटनाग्रस्त बस के घायलों को अस्पताल पहुंचाने में स्थानीय मुसलिम युवाओं ने बहुमूल्य सहयोग किया, यहां तक कि कर्फ्यू की परवाह भी नहीं की। ऐसा लगता है कि आम लोगों के बीच कोई बड़ी समस्या या वैर नहीं है। लेकिन शायद राजनेता, जो एक सेतु की भूमिका निभा सकते थे और पारंपरिक तौर पर आपस में जुड़े हुए लोगों के रिश्ते ज्यादा प्रगाढ़ कर सकते थे, राजनीतिक स्वार्थवश खाइयां खोदते रहे हैं। या कुछ मामलों में थोड़ी उलझी समस्या को सुलझाने की रणनीति में खामियों के चलते इसे पहले से ज्यादा उलझा देते हैं।

पिछले दशक में विश्व के अन्य क्षेत्रों (जैसे इराक) के अनुभव भी यही बताते हैं कि सैन्यबल से समस्या के वांछित समाधान नहीं निकलते, समस्या उलझती है या एक समस्या को हल करने की कोशिश में नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। सैन्य ताकत से हम आतंकी ठिकानों या दुश्मन के बड़े-बड़े शहरों को पल भर में तबाह तो कर सकते हैं, लेकिन उस विचार को नहीं मार सकते जो आतंकवाद को जन्म दे रहा है। विचार को हथियार से मार भी कैसे सकते हैं! वह तो अमूर्त है। आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कश्मीर के लोगों का भरोसा जीतना। किशोरों और युवाओं में भारत के विरुद्ध घृणा पैदा कर उन्हें चरमपंथ की तरफ धकेल रहे सारे संभावित कारणों पर ध्यान देना चाहिए। यह प्रश्न अवश्य विचारणीय है कि कश्मीर में बच्चे और किशोर क्यों पत्थर या बंदूक उठा रहे हैं? यह उम्र तो किताब या क्रिकेट का बल्ला पकड़ने की होती है। क्या केवल उकसावे के कारण ऐसा हो रहा है? या साथ में उनकी आंखों के सामने कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो उन्हें विवश कर रहा है? वह क्या है? इन प्रश्नों को अनदेखा करना उचित नहीं होगा। सेना और सुरक्षाबल विषम हालात में काम कर रहे हैं और लंबे समय में ये खुद भी मानसिक तनाव के शिकार हो जाते हैं। हालात सामान्य बनें और वहां के लोग भी स्वतंत्र-निर्बाध रूप से जी सकें यह एक बड़ी चुनौती है।

कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

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