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जनसत्ता चौपाल : अशोभन उवाच

कुछ ऐसी अपेक्षा शोभा ने भी भारतीय खिलाड़ियों से कर रखी है कि वे हर स्पर्धा में पदक ले आएं। संभवत उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि ओलंपिक में पदक तो दूर, उसके लिए क्वालिफाई करना भी कोई छोटी बात नहीं होती।

Author नई दिल्ली | August 22, 2016 5:39 AM
लेखिका और स्तम्भकार शोभा डे। (फाइल फोटो)

हम सब जानते हैं कि ओलंपिक में खिलाड़ियों के लिए चुनौतियां आसान नहीं होतीं। खासकर भारत जैसे देश के खिलाड़ियों के लिए, जिन्हें अपनी तैयारी पूरी करने के लिए पर्याप्त सुविधाएं या संसाधन तक उपलब्ध नहीं होते हैं। इसके बावजूद भारतीय खिलाड़ी अपने जीवन का सपना सच करने और साथ ही अपने देश के मान-सम्मान के लिए जी-जान से प्रयास करते हैं। इस कोशिश में कई खिलाड़ी पदक के बेहद करीब पहुंच कर भी चूक जाते हैं। इससे उनके साथ-साथ देशवासियों को भी निराशा तो होती ही है। लेकिन इससे खिलाड़ियों के जज्बे पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता कि वे ओलंपिक में केवल मनोरंजन के लिए जाते हैं।

मगर इस देश में कुछ ऐसी भी शख्सियतें हैं जिन्हें शायद यह बात समझ नहीं आती। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में ऐसे लोगों का उद््देश्य केवल चर्चा में आना और मीडिया में सुर्खियां बटोरना होता है। शोभा डे इन्हीं में से एक चर्चित महिला हैं। उनका मानना है कि भारतीय खिलाड़ी ओलंपिक में केवल सेल्फी लेने गए हैं और मेडल जीतने से उनका कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने भारतीय खिलाड़ियों को ‘टाइमपास’ तक कह दिया। खिलाड़ियों के साथ ऐसा मजाक निश्चित तौर पर निंदनीय और भर्त्सना-योग्य है। शायद शोभा डे के लिए ओलंपिक आज भी किसी गली-क्रिकेट जैसा ही है जहां कोई भी सचिन तेंदुलकर और डान ब्रेडमेन से कम नहीं होता, और चौके-छक्के मारना बच्चों का खेल होता है।

कुछ ऐसी अपेक्षा शोभा ने भी भारतीय खिलाड़ियों से कर रखी है कि वे हर स्पर्धा में पदक ले आएं। संभवत उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि ओलंपिक में पदक तो दूर, उसके लिए क्वालिफाई करना भी कोई छोटी बात नहीं होती। आज भी कई ऐसे खेल हैं जिनमें अब तक हम अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं करा पाए हैं। उदाहरण के तौर पर, 120 साल बाद इस ओलंपिक में किसी भारतीय जिमनास्ट ने क्वालिफाई किया। अब जरूरी तो नहीं कि इस खेल में हम पदक जीत ही पाएं। इस स्पर्धा में हम अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाए यही हमारे लिए गर्व की बात है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में हालात और भी बेहतर हों और हम अधिक से अधिक पदक ला पाएं। इसलिए शोभा डे जैसे लोगों को समझना चाहिए कि अगर वे अपने खिलाड़ियों की हौसलाअफजाई के लिए शुभकामनाएं नहीं दे सकते तो कम से कम ऐसे अनर्गल बयान देकर उनके मान-सम्मान को ठेस न पहुंचाएं।

विवेकानंद वी ‘विमर्या’, देवघर


अमन की राह
सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर तकरीबन डेढ़ महीने से हिंसा की आग में झुलस रहा है। सामान्य जन-जीवन ठप हो गया है। सुरक्षा बलों व पुलिस पर पत्थर फेंके जा रहे हैं। इस सब के पीछे कौन है? कश्मीरी युवक क्यों गुमराह हो रहे हैं? धरती का स्वर्ग कहलाने वाला यह राज्य क्यों अशांत है, सरकार को इन सब सवालों पर विचार करना होगा। अलग-अलग प्रकार के आर्थिक पैकेजों से कश्मीर का हल नहीं निकल सकता, न कश्मीरियों का दिल जीता जा सकता है। हमें यह भी सोचना होगा कि कहीं कश्मीर की आजादी का गलत मतलब तो नहीं निकाला जा रहा है? कश्मीरी किस तरह की आजादी चाहते हैं, यह लुटियन जोन के वातानुकूलित कमरों में बैठ कर तय नहीं किया जा सकता। आज तक कई समितियां, आयोग आदि बने, पर उनकी सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

मसलन, कश्मीरियों की बहुत पुरानी दो मांगें हैं- नागरिक स्थलों से सेना व सुरक्षा बलों की वापसी और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) को हटाना। भारत सरकार में इच्छाशक्ति हो तो कम से कम इन दोनों मांगों पर विचार किया जा सकता है। प्रयोग के तौर पर कुछ समय के लिए, चुनिंदा हलकों से सेना/सुरक्षा बलों और ‘अफस्पा’ को हटाया जा सकता है ताकि घाटी के लोगों को निर्भीक होकर आने-जाने की आजादी मिल सके। वे सेना-सुरक्षा बलों की शक की निगाहों या जांच-पड़ताल से आजाद हो सकें। पंद्रह-बीस दिनों या माह-दो माह बाद हालात की समीक्षा की जा सकती है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो इसका दायरा घाटी के अन्य जिलों में बढ़ा दें, अन्यथा पूर्व स्थिति जारी रहनी चाहिए। इन दोनों हालात में सेना को सीमा पर और सुरक्षा बलों को बैरकों में भेज दिया जाना चाहिए। इससे सरकार का खर्च भी बचेगा और उम्मीद है कि कश्मीर घाटी में अमन का माहौल बनेगा।
वेद प्रकाश, गुड़गांव


कथनी बनाम करनी
कलराज मिश्र स्वयं को कितना खुशनसीब मान रहे होंगे कि क्या सही मौके पर पचहत्तर साल के हुए हैं! उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर पर है और ब्राह्मण वोट की चाह भाजपा को अपने कहे का पालन न करने पर मजबूर कर रही है। क्या ब्राह्मण वोट भाजपा से खिसक रहा है? खैर, मुझे यह देख कर नजमा हेपतुल्ला और आनंदी बेन की याद आती है कि इन्हें सक्रिय राजनीति से फिर क्यों दरकिनार कर दिया गया!

अब बात आती है मार्गदर्शन की। क्या कलराजजी पार्टी को मार्गदर्शन देने के योग्य नहीं हैं या पार्टी उनका मार्गदर्शन लेना नहीं चाहती? यदि पार्टी में मंत्री पद के साथ भी मार्गदर्शन लिया जा सकता है तो आडवाणीजी और जोशीजी के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों किया गया? अच्छा है कि यह नियम सहयोगी दलों पर लागू नहीं है, नहीं तो पंजाब की राजनीति कब की खत्म हो गई होती!

विश्व रंजन शुक्ला, कानपुर


हिंसा के बीच
क्या भारतीय समाज लगातार बढ़ती हिंसा के माहौल में जीने को अभिशप्त है? इसमें यौन हिंसा सर्वाधिक शर्मनाक है। श्रीनगर में लड़कियों को स्कूटी चलाने से मना किया गया है और यह फरमान न मानने पर जिंदा जला देने की धमकी दी गई है। ‘लव जिहाद’ और ‘गोरक्षा हिंसा’ भी चिंतनीय मुद्दे हैं। इन मुद््दों पर विधायिका का एकमत नहीं होना दरअसल आर्थिकी का परिणाम है जो राजनीतिक विचारधारा को जन्म देता है। यही हाल प्रेस व मीडिया का है। हमें समझना होगा कि मुक्तबाजार को पसंद करते हुए हम पूंजीवादी शोषण से नहीं बच सकते। पूंजीवाद में निजी स्वार्थ और सामूहिक हित में जारी संघर्ष में अक्सर निजी स्वार्थ जीत जाता है; जहां हारता दीखता है वह भी अंतत: उसकी ही जीत का सोपान साबित होता है।
हमें सामूहिक हित के मसले को तय कर देशव्यापी लोकतांत्रिक आंदोलन का आगाज करना होगा।
रोहित रमण, पटना विश्वविद्यालय

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