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चौपालः बिटिया ही कीजो

सोने की कसक भले रह गई हो लेकिन चांदी और तांबे की खनक सभी देशवासियों तक पहुंची है।

Author September 2, 2016 03:15 am

सोने की कसक भले रह गई हो लेकिन चांदी और तांबे की खनक सभी देशवासियों तक पहुंची है। रियो ओलंपिक में दीपा कर्मकार, साक्षी मालिक और पीवी सिंधु ने जो किया, वह हमारे समाज में भ्रूण हत्या करने वाले लोगों के लिए सबक है कि बेटियां भी बेटों से कम नहीं, अगर उन्हें मौका मिले। इस साल का ओलंपिक सवा सौ करोड़ लोगों को इसलिए भी याद रहेगा कि खिलाड़ियों की भारी भरकम फौज गई तो जरूर लेकिन ये तीन बेटियां ही देश की नाक बचा पार्इं। यह इस तथ्य के बावजूद है कि हमने आज तक महिलाओं और लड़कियों के लिए अलग दुनिया बना रखी है। वे जींस नहीं पहन सकतीं, बाजार नहीं जा सकतीं, उच्च शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकतीं, आदि। हम विकास के शिखर पर हैं, लेकिन दकियानूसी सोच हमारे जेहन से निकल ही नहीं पा रही है।

अक्सर बलात्कार, दहेज उत्पीड़न, महिला उत्पीड़न की घटनाओं के बीच जब सुनने को मिलता है कि देश के किसी हिस्से में एक लड़की को अमुक कामयाबी मिली तो सोचने लगता हूं कि इस कामयाबी की राह में कितनी कठिनाइयां आई होंगी! किन-किन यातनाओं को झेलने के बाद वह यहां तक पहुंची होगी? कामयाब पुरुषों को भी परेशानियों से गुजरना पड़ता है पर एक लड़की जब अपने घर से बाहर कदम रखती है तो सबसे पहले उसे अपनों से ही जूझना पड़ता है। फिर समाज और व्यवस्था से भी। इसके बाद यदि किसी को कामयाबी की मंजिल मिलती है तो जरूर प्रशंसनीय है। आज भी गांव से शहरों तक स्त्रियों की एक बड़ी आबादी शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन यापन से वंचित है। इसमें सरकार से लेकर समाज का हर वह व्यक्ति शामिल है जो यह सब देखकर चुप है।

लड़की बचाओ लड़की पढ़ाओ जैसी योजनाएं चला कर सरकार ने लड़कियों के संरक्षण का संदेश दिया है लेकिन इतने से काम नहीं चलेगा। मेरे गांव के बगल में एक महिला फुटबॉल टीम कई वर्षों से खेल रही है। इस टीम से अनेक लड़कियां राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। लेकिन इससे इतर कई महिला खिलाड़ी हैं जो फुटबॉल के हुनर को त्याग कर चूल्हा-चौका संभाल रही हैं। इनसे बातचीत में अक्सर सुनने को मिलता है कि देश में खेल की संस्कृति ही नहीं है। अपने दम पर खेलो, सफलता मिली तो ठीक, नहीं तो रोजगार में लग जाओ! कभी-कभी गेंद और बूट के पैसे के लिए इन लड़कियों को गांव के लोगों के आगे झोली फैलानी पड़ती है। चंदे के बल पर ये मैदान में आ पाती हैं।
खैर, तमाम तरह की कठिनाइयों के बावजूद देश की कुछ बेटियों ने जो कामयाबी की इबारत लिखी है उसे भुलाया नहीं जा सकता है। देश की आधी आबादी के लिए ये प्रेरणा स्रोत हैं। रियो ओलंपिक के इन सितारों को देख कर देश की हर बेटी यही दुआ मांगेगी कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो और हर माता-पिता यही प्रार्थना करेंगे कि उनकी संतानें इसी तरह देश की शान बढ़ाएं।
’अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय्

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