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लोकभाषाओं की खातिर

जब छोटा बच्चा स्कूल जाने लगता है तो उसकी शिक्षा प्रादेशिक भाषा में होती है। स्कूल की भाषा और घर की भाषा का अंतर शिशु को दुविधा में डाल देता है।

Author August 30, 2017 5:45 AM
सांकेतिक फोटो

विश्वास व अंधविश्वास
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सुनाई गई बीस साल की सजा ने इस ‘बाबा’ को आंसू बहाने पर मजबूर कर दिया, यह असल मायनों में कानून की सर्वोच्चता सिद्ध करता है।  इस तरह के अपराध भविष्य में न हों, इसका सिर्फ एक उपाय है, लोगों में अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूकता फैलाना और मानवता से सच्चा परिचय कराना। गौरतलब है कि हमारी ज्यादातर ग्रामीण जनसंख्या अब भी अंधविश्वासों में उलझी हुई है। उम्मीद है कि इस फैसले से उसकी आंखें खुलेंगी। लेकिन यह तभी संभव है जब लोग कानून को सर्वोपरि मानकर इस फैसले का सम्मान करेंगे। वरना गुरमीत राम रहीम जैसा कोई और बाबा आकर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर जाएगा और लोग उसके पक्ष में भी हिंसक प्रदर्शन करते रहेंगे।
’निकिता राधा मंडलोई, इंदौर
लोकभाषाओं की खातिर
अरविंद जयतिलक ने ‘खतरे में लोकभाषाएं’ (28 अगस्त) लेख में लोकभाषाओं को बचाने के लिए दो सुझाव दिए हैं- लोकभाषाओं में शिक्षा और इनमें रोजगार के अवसर पैदा करना। ये दोनों सुझाव अव्यावहारिक प्रतीत होते हैं। अपने प्रयोग की दृष्टि से लोकभाषाएं परिवारबद्ध और स्थानबद्ध होती हैं। सबसे पहले परिवार के अंदर इनका लोप होने लगता है। जब छोटा बच्चा स्कूल जाने लगता है तो उसकी शिक्षा प्रादेशिक भाषा में होती है। स्कूल की भाषा और घर की भाषा का अंतर शिशु को दुविधा में डाल देता है।

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इसका एक समाधान यह हो सकता है कि स्कूल की आरंभिक पढ़ाई में (कक्षा 3 तक) सप्ताह में एक दिन आधा घंटे के लिए स्थानीय भाषा को स्थान दिया जाए। सप्ताह में एक दिन शिशुओं को अपनी-अपनी भाषाओं में लोककथाएं और लोकगीत सिखाए जाएं। इसके लिए स्थानीय निवासियों की भागीदारी लाभदायक हो सकती है। लोकभाषाओं को बचाने का यह एक उपाय है क्योंकि इस अवस्था में शिशुओं के लिए स्कूल के अध्यापिका/ अध्यापक की कही बात ही ब्रह्म-वाक्य होती है।
’हेमचंद्र पांडे, हौज खास, नई दिल्ली

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