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स्वच्छता की उपेक्षा

अफसोस की बात है कि देश में स्वच्छता को लेकर आमजन गंभीर नहीं हैं। इसीलिए गली-मोहल्ले कचरे से अटे पड़े हैं। बड़े बाजारों से लेकर पर्यटन केंद्रों व धार्मिक स्थानों पर फैला कचरा आसानी से देखा जा सकता है। जिन गांवों व शहरों में प्रमुख मंदिर हैं वहां मेलों के दौरान आस्था के सैलाब में डूबे श्रद्धालु गंदगी का अंबार छोड़ कर चले जाते हैं।

Author January 10, 2019 3:40 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

अफसोस की बात है कि देश में स्वच्छता को लेकर आमजन गंभीर नहीं हैं। इसीलिए गली-मोहल्ले कचरे से अटे पड़े हैं। बड़े बाजारों से लेकर पर्यटन केंद्रों व धार्मिक स्थानों पर फैला कचरा आसानी से देखा जा सकता है। जिन गांवों व शहरों में प्रमुख मंदिर हैं वहां मेलों के दौरान आस्था के सैलाब में डूबे श्रद्धालु गंदगी का अंबार छोड़ कर चले जाते हैं। स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद सफाई व्यवस्था बदहाल है। पार्क, बस अड्डों व रेलवे लाइनों के आस-पास कचरे के ढेर लगे रहते हैं। सब जानते हैं कि स्वच्छता का हमारे जीवन में अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। कहा भी गया है कि मनुष्य का पहला सुख निरोगी काया होता है। यदि हम साफ-सफाई से नहीं रहेंगे तो काया निरोगी नहीं रह सकती। इसलिए हमें अपने घर, घर के आसपास और सार्वजनिक स्थानों की सफाई अच्छे ढंग से करनी चाहिए।

सफाई व्यवस्था सुधारने की दिशा में स्थानीय निकायों को भी गंभीर होना चाहिए। आवश्यकतानुसार सफाईकर्मियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। घर-घर कचरा संग्रहण की व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करना होगा। व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों के आगे कचरा पात्र अनिवार्यत: रखें। पॉलिथीन रखने वालों पर जुर्माना लगाया जाए। स्थानीय निकायों द्वारा सफाई को लेकर की जा रही कार्रवाई में आम जन सहयोग करें। जिम्मेदार अधिकारी व जनप्रतिनिधि सफाई कार्यों के लिए उपलब्ध बजट का सही उपयोग करें तो देश में सफाई अवश्य नजर आएगी। कचरा कूड़ेदान में ही डालने के लिए सामाजिक संस्थाएं व सेवानिवृत्त लोग जनजागरण अभियान चलाएं। विद्यालयों में बच्चों को सफाई के प्रति जागरूक किया जाए। उन्हें प्रतिज्ञा दिलाई जाए कि गंदगी नहीं फैलाएंगे और कूड़ेदान में ही कचरा डालेंगे। देश को गंदगी से मुक्त करने व हरियाली को बढ़ावा देने के लिए सभी को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
’राजेंद्र कुमार कुमावत, जयपुर

हादसे का सबक
दिल्ली के मोतीनगर इलाके में एक फैक्ट्री में धमाके से सात लोगों की मौत हो गई। यह फैक्ट्री अवैध रूप से चलाई जा रही थी। इस हादसे के लिए जितना दोषी फैक्ट्री मालिक है उतना ही जिम्मेदार प्रशासन भी है। यह प्रशासन की घोर लापरवाही और भ्रष्ट रवैया है कि उसकी नाक के नीचे ऐसी फैक्ट्रियां चलाई जा रही हैं। सिर्फ मोतीनगर नहीं, दिल्ली के अनेक इलाकों में अवैध फैक्ट्रियां धड़ल्ले से चल रही हैं फिर भी प्रशासन कुंभकरणी नींद सोया हुआ है। अब तो दिल्ली सरकार को सचेत हो जाना चाहिए और हर संभव प्रयास द्वारा ऐसी अवैध फैक्ट्रियों को बंद कराना चाहिए। इस हादसे को एक सबक के रूप में लेकर ऐसे इंतजाम किए जाने चाहिए कि फिर कहीं निर्दोष लोगों को अपनी जान न गंवानी पड़े।
’चांद मोहम्मद, दिल्ली विश्वविद्यालय

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