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आरक्षण की राजनीति

रेलवे में लगभग आधे पद खाली पड़े हैं, शिक्षकों के भी लाखों पद खाली हैं। ऐसे ही तमाम विभागों में बहुत सारे पद रिक्त हैं। ये पद खाली ही रहने वाले हैं या फिर ठेके पर दिए जाएंगे। उत्तर प्रदेश में तो बाकायदा आदेश जारी कर दिया गया है कि दो विभागों को छोड़कर चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्थायी भर्ती नहीं होगी।

Author January 10, 2019 3:31 AM
9 जनवरी 2019 को 10% आर्थिक आरक्षण बिल राज्यसभा में चर्चा। (image source-ANI)

रेलवे में लगभग आधे पद खाली पड़े हैं, शिक्षकों के भी लाखों पद खाली हैं। ऐसे ही तमाम विभागों में बहुत सारे पद रिक्त हैं। ये पद खाली ही रहने वाले हैं या फिर ठेके पर दिए जाएंगे। उत्तर प्रदेश में तो बाकायदा आदेश जारी कर दिया गया है कि दो विभागों को छोड़कर चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्थायी भर्ती नहीं होगी। मतलब यह कि एक तरफ रोजगार बड़ी तेजी से खत्म किया जा रहा है और दूसरी तरफ ‘गरीबों’ को आरक्षण देने की तैयारी है! अब बहनजी और भैयाजी युद्ध छेड़ देंगे। बहनजी ने भैयाजी को फोन भी कर दिया है। इन पार्टियों ने कभी भी इसके लिए अपने कार्यकताओं को सड़क पर नहीं उतारा कि सरकारी विभागों का निजीकरण बंद किया जाए। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियां वापस ली जाएं। सबको रोजगार दिया जाए। ऐसा इसलिए कि सत्ता में रहने पर इन्हें भी उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाना है। लेकिन अब आरक्षण के मुद्दे पर ये चुनावी मदारी इतनी चौं-चौं करेंगे कि अलग-अलग जातिगत आधार पर बंटे समूह के नौजवानों तक को लगने लगेगा कि ‘आरक्षण’ मिल जाए या फिर खत्म हो जाए तो उनका कल्याण हो जाएगा! फिर नौजवान आपस में लड़ेंगे लेकिन कल्याण चुनावी मदारियों का होगा! इस घमासान के बीतने के बाद हर जाति के करोड़ों नौजवान सड़कों पर चप्पल फटकारते घूम रहे होंगे। निराशा, अवसाद के शिकार होकर पंखे से लटकाने के लिए गमछा खोज रहे होंगे!

साफ है कि खुलेआम दांव खेला जा रहा है। क्या हम इतनी बात नहीं समझ सकते कि आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में लड़ना इन्हीं चुनावी मदारियों के जाल में फंसे रहना है। जब ये उन नौकरियों को भी खत्म करते जा रहे हैं जो नब्बे के दशक के पहले थीं, जब नौकरियां ही बहुत कम हैं तो आरक्षण के होने या न होने से क्या फर्क पड़ेगा! क्या यह बात हम नहीं समझ सकते? ये नौजवानों को आपस में उलझाना चाहते हैं ताकि वे जाति-धर्म से ऊपर उठ कर ‘सबको रोजगार’ के नारे पर सरकार व लूट पर टिकी इस व्यवस्था के खिलाफ एकजुट न हो सकें। हमें यह बात समझानी होगी और एकजुट होकर अपना दांव खेलना होगा कि सबको रोजगार दो! फिर देखिए, अलग-अलग झंडे व नाम के चुनावी मदारी सबके सब बेपर्दा हो जाएंगे। हमें उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के खिलाफ डट कर खड़े होना होगा। इन नीतियों पर सभी चुनावी मदारियों में सहमति है और इनकी वजह से जो थोड़ी-बहुत नौकरियां थीं वे भी खत्म होती जा रही हैं। हमें यह भी समझना होगा कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में लूट और मुनाफे पर टिकी व्यवस्था उतने भी रोजगार पैदा करने में अक्षम है जितने यह पहले पैदा कर पाती थी। इसलिए हमें इस व्यवस्था के खिलाफ भी एक लंबी लड़ाई के लिए कमर कसनी होगी।
’प्रसेन, इलाहाबाद

हंगामे के बजाय
संसद में विधायी कामकाज कम और हंगामा अधिक होने के लिए जितने जिम्मेदार सांसद हैं, उससे अधिक राजनीतिक दलों का नेतृत्व है। आम तौर पर अपने नेता और नेतृत्व के इशारे पर ही जनप्रतिनिधि सदन में हंगामा करते हैं। एक समस्या यह भी है कि संसद में अपने दायित्वों का सही तरह निर्वाह करने वाले सांसदों से अधिक चर्चा उन्हें मिलने लगी है जो येन-केन-प्रकारेण सदन की कार्यवाही में खलल डालते हैं। संसद सत्तापक्ष और विपक्ष के समन्वय और ज्वलंत मसलों पर सार्थक बहस के प्रति दिलचस्पी से ही चल सकती है। बेहतर होगा कि सभी दल गंभीरता से विचार करें कि इस स्थिति का निर्माण कैसे हो। अगर संसद में इसी तरह हंगामा होता रहा तो उसकी महत्ता कायम रहना कठिन है।
’हेमंत कुमार, ग्राम/पोस्ट-गोराडीह, भागलपुर

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