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युवाओं की सुध

आज युवा दिवस है। जिस युवा के कंधे पर देश का भविष्य टिका है, वास्तव में आज उसे ही नहीं पता कि उसका भविष्य कितना उज्ज्वल है! नेताओं से ज्यादा चुनाव का इंतजार आज के युवा को रहता है क्योंकि चुनाव नजदीक हो तो युवाओं की बात जोर-शोर से उठने लगती है।

Author January 12, 2019 4:31 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

आज युवा दिवस है। जिस युवा के कंधे पर देश का भविष्य टिका है, वास्तव में आज उसे ही नहीं पता कि उसका भविष्य कितना उज्ज्वल है! नेताओं से ज्यादा चुनाव का इंतजार आज के युवा को रहता है क्योंकि चुनाव नजदीक हो तो युवाओं की बात जोर-शोर से उठने लगती है। युवाओं को लुभाने के लिए कई विभागों में नौकरियां भी निकाल दी जाती हैं। सालों के इंतजार के बाद जब कहीं रिक्तियां निकलती हैं तो पद और योग्यता को दरकिनार कर जिसे जहां मौका मिल जाए वहीं आस लगाकर आवेदन कर देता है। इस उम्मीद के साथ कि अब उसे कोई एक स्थायी रोजगार मिल जाएगा फिर चाहे वह चतुर्थ श्रेणी का ही कोई पद क्यों न हो।

युवाओं का देश कहलाने वाले भारत में युवा रोजगार की हकीकत यह है कि पिछले साल जब भारतीय रेलवे की तरफ से चतुर्थ श्रेणी पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया था तो आवेदनों की संख्या और आवेदकों की योग्यता को देखकर खुद रेलवे हैरान रह गया था। देशभर से रेलवे को दो करोड़ से आधिक आवेदन प्राप्त हुए थे जिसकी परीक्षा दो महीने में संपन्न हुई थी। सरकार भले ही आंकड़ों के माध्यम से समझाती हो कि देश में बेरोजगारी कम हुई है, पर हकीकत यह है कि आज भी किसी प्रतियोगी परीक्षा के दिन रेलगाड़ियों और बसों में पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। आंकड़ों की बाजीगरी से हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता। देश में हर साल डिग्रीधारियों की नई फौज तैयार हो रही है जिससे डिग्री और नौकरी के बीच फासला लगातार बढ़ता ही जा है। देश में सरकारी नौकरी की तैयारी कराने के नाम पर खुलने वाले कोचिंग सेंटरों का जाल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। आलम यह है कि बहुत से लोगों का रोजगार बेरोजगारों पर ही निर्भर है।

भारत में बढ़ती बेरोजगारी को मौजूदा शिक्षा व्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आज इंजीनियर, एमसीए, बीसीए जैसे डिग्रीधारी भी बेरोजगार हैं या वे किसी दूसरे क्षेत्र में काम में लगे हैं जिसका उनकी वास्तविक शिक्षा से कोई सरोकार नहीं है। रोजगार के लिए उन्होंने अपने सपने और हुनर को दरकिनार कर दिया है। हमारी शिक्षा पद्धति में विभिन्न संकाय जरूर उपलब्ध हैं जिसमें कहा जाता है अपनी रुचि का विषय चुनें पर विषय और संस्थान कोई भी हो रुचि और कौशल के नाम पर उन्हें चंद किताबें थमा दी जाती हैं। प्रयोगशाला के नाम पर उन्हें डायग्राम दिखा कर बरगला दिया जाता है। नतीजा, लाखों रुपए फीस चुका कर मिली डिग्री बाजार में महज कागज का टुकड़ा साबित होती है। यदि हम देश के शीर्ष संस्थानों को छोड़ दें तो ज्यादातर संस्थानों में आज उच्च तकनीकयुक्त क्लासरूम तक मौजूद नहीं हैं। हुनर के अभाव के चलते ही देश के लोगों को अब एक अच्छे मिस्त्री, मैकेनिक, दर्जी या खाती आदि की तलाश में दर-दर भटकना पड़ता है।

सरकार को बेरोजगारी के खिलाफ कार्ययोजना तैयार करते हुए इस मुद्दे पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए। सामान्य श्रेणी को शिक्षा और नौकरियों में दस फीसद आरक्षण के साथ ही सरकार को नई नौकरियों के सृजन पर भी बल देना चाहिए। सबको शिक्षा के मुताबिक रोजगार देकर ही समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है। बेरोजगार युवा आज तनाव की जिंदगी जी रहे हैं। बढ़ती बेरोजगारी उनके आत्मविश्वास को तोड़ रही है, वहीं इससे पैदा मानसिक तनाव उनके युवा होने का एहसास खत्म कर रहा है।
’रोहित यादव, एमडीयू, रोहतक, हरियाणा

दुरुस्त आयद
केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के युवाओं को सरकारी नौकरियों और शिक्षा आदि में दस फीसद आरक्षण देने का कानून बनाया है। देर से ही सही, सरकार ने यह एक सराहनीय कदम उठाया है। लेकिन मीडिया में इस आरक्षण को ‘सवर्ण आरक्षण’ के नाम से प्रचारित किया जा रहा है जबकि इसे सवर्ण की जगह ‘सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण’ लिखा जाना चाहिए। इस आरक्षण के लाभार्थी वे सभी लोग होंगे जो सामान्य वर्ग के हैं; आठ लाख रुपए सालाना से कम कमाते हैं और पांच एकड़ से कम जमीन के मालिक हैं। फिर चाहे वे हिंदू हों, मुसलिम हों या ईसाई। हर धर्म के आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को इस आरक्षण का लाभ मिलेगा, न कि सिर्फ हिंदू सवर्णों को।
’उपासना, दिल्ली विश्वविद्यालय

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