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किसानों की खातिर

किसानों की कर्ज माफी की खबर जैसे ही आती है एक बहुत बड़ा तबका कहना शुरू करता है कि यह मुफ्तखोरी है, इससे अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ेगा और राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा, आदि-आदि। इसके उलट जब कॉरपोरेट घरानों के कर्ज बट्टे खाते में डाले जाते हैं, उन्हें करों में छूट दी जाती है तब इसे देश के आर्थिक विकास के लिए शुभ माना जाता है!

Author January 11, 2019 3:55 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Express Archives)

किसानों की कर्ज माफी की खबर जैसे ही आती है एक बहुत बड़ा तबका कहना शुरू करता है कि यह मुफ्तखोरी है, इससे अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ेगा और राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा, आदि-आदि। इसके उलट जब कॉरपोरेट घरानों के कर्ज बट्टे खाते में डाले जाते हैं, उन्हें करों में छूट दी जाती है तब इसे देश के आर्थिक विकास के लिए शुभ माना जाता है! अगर आंकड़ों पर गौर करें तो किसानों के जितने कर्ज पिछले दस सालों में विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा माफ हुए हैं उससे अधिक कर्ज कॉरपोरेट के तीन सालों में बट्टे खाते में डाले गए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मुताबिक अलग-अलग राज्य सरकारों ने जहां पिछले दस सालों में किसानों के 2.21 लाख करोड़ के कर्ज माफ किए हैं वहीं तीन साल में कॉरपोरेट सेक्टर के 2.4 लाख करोड़ के कर्ज बट्टे खाते में डाले गए हैं। अप्रैल 2018 में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया कि आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने कॉरपोरेट सेक्टर के 2,41,911 करोड़ रुपए के ‘बैड लोन’ बट्टे खाते में डाले दिए हैं। यह प्रक्रिया 2014-15 से लेकर 2017 के बीच पूरी की गई।

इसके अलावा कॉरपोरेट सेक्टर को करों में भी भारी छूट दी गई है। संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक अकेले 2015-16 में ही 6.11 लाख करोड़ की कर छूट दी गई। 2004 से 2015-16 के बीच के 12 बरसों के दौरान उद्योग क्षेत्र को दी गई कुल कर-राहत 50 लाख करोड़ के बराबर थी। वर्ष 2012-13 में कारपोरेट जगत को करों में 68,720 करोड़ रुपए की छूट मिली जबकि 2016-17 में उसे करों में 86,144.82 करोड़ रुपए की छूट हासिल हुई और वित्तवर्ष 2017-18 में 5,026.11 करोड़ रुपए की। देश के सरकारी बैंकों का एनपीए तेजी से बढ़कर 10 लाख करोड़ के पार जाने वाला है। इस एनपीए में भी कृषि क्षेत्र का हिस्सा सिर्फ आठ फीसद है बाकी हिस्सा कॉरपोरेट सेक्टर का ही है। कॉरपोरेट के कर्ज कब बट्टे खाते में डाल दिए जाते हैं, टैक्स में कब छूट मिल जाती है देश की जनता को इसके बारे में जानकारी भी नहीं मिलती लेकिन किसानों की कर्ज माफी ढोल पीटकर की जाती है!

यह सच है कि कर्जमाफी किसानों की समस्या का अंत नहीं है। कर्जमाफी कर किसानों का हमदर्द दिखने की कोशिश करने वाली सरकार किसानों को बाद में भूल जाती है। अगर सरकार चाहती है कि किसानों के कर्ज माफ करने की नौबत ही न आए तो सबसे पहले सरकार को किसानों के लिए ठोस नीति बनानी होगी। फसल की लागत बिना सब्सिडी दिए कम आए इस दिशा में कार्य करने की जरूरत है। दूसरा, किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिले यह सुनिश्चित करने की जरूरत है। सरकार एमएसपी तय तो कर देती है लेकिन किसानों को उसका लाभ नहीं मिलता है। एक आंकड़े के मुताबिक सिर्फ दस प्रतिशत किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी फसल बेच पाते हैं। प्राकृतिक आपदा के बाद किसानों की फसल क्षति के सही आकलन की भी जरूरत है ताकि उन्हें उचित मुआवजा मिल सके। कॉरपोरेट को छूट देना अगर जरूरी है तो किसानों को सहयोग देना भी बेहद जरूरी है। सरकार ऐसी नीति बनाए कि कॉरपोरेट और किसान एक दूसरे के विपरीत नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक दिखें। यही देश की आर्थिक उन्नति और रोजगार का माध्यम बनेगा।
’अभिषेक कुमार चौधरी, अररिया, बिहार

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