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आर्थिक आधार

आज के अर्थ-प्रधान युग में आर्थिक पिछड़ापन ही बहुधा सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का कारण होता है। गरीब सवर्ण और गरीब अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग करीब-करीब एक सी मुश्किलों-मुसीबतों से जूझते हैं।

Author January 11, 2019 4:00 AM
प्रतीकात्मक फोटो। (Photo-Reuters)

आज के अर्थ-प्रधान युग में आर्थिक पिछड़ापन ही बहुधा सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का कारण होता है। गरीब सवर्ण और गरीब अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग करीब-करीब एक सी मुश्किलों-मुसीबतों से जूझते हैं। उच्चतम न्यायालय ने भी आर्थिक पिछड़ेपन को अन्य प्रकार के पिछड़ेपन के कारक के रूप में पहचाना है। लेकिन संविधान में क्योंकि केवल सामाजिक-शैक्षिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था है, इसलिए आर्थिक आधार को न्यायालय अपनी ओर से कैसे मान्य कर सकते थे! अब क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए संविधान-संशोधन पारित हो गया है, गरीब सवर्णों के दिल की पुकार पूरी हो सकेगी। जहां तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा साहनी केस में लगाई गई 50 फीसद अधिकतम आरक्षण की शर्त का प्रश्न है, वह सामाजिक-शैक्षिक आरक्षण के लिए थी। अभी आर्थिक आरक्षण के संबंध में अदालत को अधिकतम सीमा तय करनी है।
’आस्था गर्ग, मेरठ, उत्तर प्रदेश

रोजगार का सवाल
भारत में बेरोजगारी अमरबेल की तरह बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार नए रोजगार सृजन की बात तो दूर, रोजगारशुदा लोगों के भी बेरोजगार होने का सिलसिला तेज हो गया है। सत्तारूढ़ पार्टी ने चुनाव से पहले सालाना दो करोड़ रोजगार देने की बात कही थी लेकिन सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी द्वारा हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में एक करोड़ नौ लाख लोगों ने नौकरियां गंवाई हैं। इनमें सें 91 लाख लोगों को ग्रामीण क्षेत्र और 18 लाख को शहरी क्षेत्र में रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। दरअसल, सरकारें युवाओं के साथ केवल छल कर रही हैं। यदि ऐसे ही चलता रहा तो देश के सामने भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी, जिससे पार पाना किसी सरकार के बस में नहीं होगा। युवाओं को भी एकजुटता के साथ सरकारों पर रोजगार सृजन के लिए दबाव बनाना चाहिए। सरकारें और राजनीतिक पार्टियां युवाओं के साथ भावनात्मक खिलवाड़ करना बंद करें।
’हरेंद्र सिंह कीलका, सीकर

दयनीय दशा
गाय को माता मानने वाले देश में आज उनकी हालत दयनीय है। चौराहे पर खड़ी गायों के झुंड हम सभी देखते रहते हैं। वे पॉलिथिन की थैलियां तक खाने पर मजबूर हैं। अफसोस की बात है कि हम गायों को केवल मतलब के लिए इस्तेमाल करते हैं। जब चुनाव की बात आती है तो गाय को लेकर खूब राजनीति की जाती है। हिंदू-मुसलिम मुद्दे को जब हवा देनी हो तो गाय आ जाती है। इसके बाद कोई सुध नहीं लेता कि गायों का क्या हो रहा है।
’प्रेरणा, भोपाल

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