irom sharmila fast break kejriwal mahatma gandhi jansatta chaupal - Jansatta
ताज़ा खबर
 

चौपालः हताशा का भंवर

व्यवस्था जैसी ही कालिख मल कर व्यवस्था की कालिख को मिटाया जा सकता है। अब व्यवस्था बन कर व्यवस्था को एकल रूप से कितना कुछ बदला जा सकता है।

Author नई दिल्ली | August 15, 2016 4:46 AM
प्रेस कॉन्फ्रेंस करतीं इरोम शर्मिला। (पीटीआई फाइल फोटो)

कुछ लोग कहते हैं कि इरोम चानू शर्मिला प्रतिरोध की लड़ाई हार गई हैं तो कुछ लोग विजेता के रूप में उनकी महिमा गा रहे हैं। सबका अपना-अपना नजरिया है। मगर केजरीवाल एपिसोड के बाद एक बार फिर यह सिद्ध हुआ है कि व्यवस्था को बदलने के लिए व्यवस्था का हिस्सा ही बनना पड़ता है। व्यवस्था जैसी ही कालिख मल कर व्यवस्था की कालिख को मिटाया जा सकता है। अब व्यवस्था बन कर व्यवस्था को एकल रूप से कितना कुछ बदला जा सकता है, इस बात के प्रमाण आने शेष हैं। विगत अनुभव तो यही कहते हैं कि ताकत, सत्ता और प्रभाव व्यक्तिगत प्रहार से कभी अपना चोला नहीं बदलते। वे कभी अपना अर्जित निर्मम आचरण भी नहीं बदलते। बदलना बदलाव-परस्त पैरोकारी को ही पड़ता है।

अनशन कितने कारगर होते हैं यह भी सर्वज्ञात है। महात्मा गांधी ने अनशन के दम पर अंग्रेजों को झुकाया यह आज के दौर में एक अविश्वसनीय सच्चाई है। अपवादस्वरूप केजरीवाल जरूर अनशन की सीढ़ी चढ़ कर राजनीति में प्रवेश कर गए हैं। मगर केजरीवाल के इस चक्रव्यूह-प्रवेश में अण्णा हजारे की ख्याति का अपूर्व योगदान था। अब केजरीवाल सत्ता और व्यवस्था को कितना बदल पा रहे हैं, यह हम सभी देख-समझ रहे हैं। उलटे वे इस निर्मम व्यवस्था के अथाह दलदल में धंसते जा रहे हैं। ऐसे में इरोम शर्मिला राजनीति में कैसे प्रवेश करेंगी और कितना व्यवस्था को अपने पक्ष में झुका सकेंगी, यह एक विचारणीय पक्ष है।

सोलह बरस के अनशन-उपवास के बाद सत्ता को वे तनिक भी विचलित नहीं कर सकीं, यह एक त्रासद पहलू है। एक तरफ तो हमारी सत्ता आतंकियों के आगे नतमस्तक होकर उन्हें अपने हवाई जहाज से कंधार तक छोड़ आती है वहीं दूसरी तरफ वह एक महिला का अखंड उपवास खंडित करने के लिए जरा भी नहीं झुक पाती। वैसे ही विगत में अनशन पर बैठे एक योगी-बाबा की जिद के आगे झुक कर सत्ता अपने आला कैबिनेट मंत्रियों को भेज कर उनका उपवास खंडित कराती है। वहीं शर्मिला की मांग की सुध लेने के लिए सोलह बरस तक उसके पास वक्त नहीं निकल पाता।

राजेश सेन, अंबिकापुरी एक्सटेंशन, इंदौर


ये बलिदानी
प्रधानमंत्री मोदी ने महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के जन्मस्थान- मध्यप्रदेश के भाबरा ग्राम- में उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित कर ‘जरा याद करो कुरबानी’ कार्यक्रम की शुरुआत की है। राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण के लिए ऐसे कार्यक्रम बेहद जरूरी हैं। जो कौम अपने शहीदों को भूल जाती है, वह महान कार्य संपन्न नहीं कर सकती। 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान दस से पंद्रह तारीख के बीच किशोर-किशोरियों से लेकर वृद्धों तक अनेक वीरों ने देश पर प्राण न्योछावर किए थे।

कटिहार (बिहार) का तेरह वर्षीय बालक ध्रुव कुंडू, जो एक सरकारी इमारत पर तिरंगा फहराने का प्रयास कर रहा था, वहां के जिलाधिकारी की गोली का शिकार होकर शहीद हुआ। असम की चौदह वर्षीय किशोरी कनक लता बरुआ गोपुर की पुलिस चौकी पर तिरंगा लगाने की कोशिश में एक पुलिस वाले की फायरिंग में शहीद हो गई। बंगाल में तिहत्तर वर्षीय मातंगिनी हाजरा भी तिरंगे के साथ आगे बढ़ते हुए सेना द्वारा चलाई गोली से शहादत को प्राप्त हुर्इं। पूरे देश में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन (1942-43) में 538 स्थानों पर गोलियां चलीं जिनमें लगभग सात हजार स्त्री-पुरुष-बालक-बालिका बलिदान हुए। इनकी, और जंगे-आजादी के अन्य हजारों वीरों की पावन स्मृति को संजो कर नई पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

अजय मित्तल, खंदक, मेरठ


छुट्टी का घंटा
प्रेमपाल शर्मा का लेख ‘सुविधा के द्वीप’ (दुनिया मेरे आगे, 8 अगस्त) पढ़ कर अपने बचपन के दिनों में खो गया। लेखक ने स्कूली जीवन में छुट्टी के घंटे का बड़ा मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। लगता है, केदारनाथ अग्रवाल की कविता ‘छुट्टी का घंटा’ का वास्तविक रूप चरितार्थ हो गया। बचपन का दृश्य कितना मार्मिक होता है उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। स्कूल में प्रवेश करने के पश्चात एक के बाद एक कक्षा-संचालन के लिए घंटे बजते रहते हैं। लेकिन स्कूल की अंतिम घंटी कितनी महत्त्वपूर्ण होती है इसे विद्यार्थियों के निश्छल चेहरों की रौनक देख कर पहचाना जा सकता है।

सुबह से लेकर दोपहर तक की थकान मानो क्षण भर में दूर हो जाती है। स्कूल प्रांगण से बाहर निकल कर उनका खिलखिलाहट से उन्मुख चेहरा हमें यशपाल कमेटी की रिपोर्ट ‘एजुकेशन विदाउट बर्डन’ की याद दिलाता है। इस बीच दुख होता है कि शिक्षा के मूल अधिकार के रूप में लागू होने के बावजूद हम हजारों-लाखों की संख्या में ऐसे बच्चे-बच्चियों को देखते हैं जो स्कूल के बजाय काम पर जा रहे होते हैं। क्या उनके जीवन में ‘मस्ती की पाठशाला’ नहीं हो सकती? आखिर इस तरह के विषमतापूर्ण समाज से हम अपने देश को कहां ले जा रहे हैं?

रणजीत कुमार झा, दिल्ली विश्वविद्यालय


देशज संस्कृति
आधुनिकीकरण के क्रम में देशज संस्कृति का आदर होना चाहिए। स्वदेशी के पैरोकार पश्चिम के हित में विभिन्न संस्कृतियों और राष्ट्रीय पहचानों को षड्यंत्रपूर्वक नष्ट-भ्रष्ट कर देने की कोशिशों का विरोध करते हैं। उनके विरोध का एक अहम कारण यह भी है कि आधुनिक पश्चिमी तकनीक और आर्थिक प्रणाली के साथ एक ऐसी सभ्यता आ रही है जो गैर-पश्चिमी सभ्यताओं के अनुकूल नहीं है।

देवेंद्र्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान


गरिमा के विरुद्ध
देश में मोदी और केजरीवाल जिस भाषा का प्रयोग करते हैं उससे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पद की गरिमा को ठेस लगती है। केजरीवाल ने फरमाया कि मोदी उन्हें मरवा सकते हैं। भला केजरीवाल की हत्या कराकर मोदी को क्या हासिल होगा? इसी तर्ज पर मोदी का यह कहना कि मुझे गोली मार दो, क्या जनता को गलत काम करने के लिए नहीं उकसाता? या यह वोट बैंक के लिए जुमला मात्र है? जनता ने इन दोनों को जो बहुमत दिया है उसके लिए काम करें, नाटक नहीं। वरना मतदाता बाहर का रास्ता दिखाने में जरा भी देर नहीं करेंगे।

यश वीर आर्य, देहरादून

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App