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जनसत्ता चौपाल : आजादी के गीत

राजनीतिक आजादी मिल जाने के बावजूद एक टीस थी जो पंजाब के हिंदुओं-सिखों और मुसलमानों के मन में देर तक उठती रही थी, और क्योंकि दुख का चेहरा दोनों तरफ एक जैसा था।

Author नई दिल्ली | Published on: August 24, 2016 6:12 AM
श्रीनगर के बख्शी स्टेडियम में आयोजित राजकीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती। (AP Photo/Dar Yasin)

हर बरस, स्वतंत्रता-दिवस से कुछ दिन पहले से ही आकाशवाणी पर देशप्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं। कुछ जोशीले, कुछ दर्दीले तो कुछ देश के प्रति सहज अनुराग से भरे। मूल भाव तो देशप्रेम ही रहता है पर समय और स्थिति के अनुसार उसके संदर्भ अलग हो जाते हैं। अगस्त, उन्नीस सौ सैंतालीस में विभाजन की घोषणा होने पर सांझे पंजाब में जो मंजर बना, उसे देखकर भारत-पाकिस्तान के सांझे शायर फैज अहमद फैज ने अपनी एक नज्म में कहा था -‘ये दाग-दाग उजाला, ये शब गजीदा सहर / वो इंतजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं।’ चार-पांच दिनों में दस लाख निर्दोष लोगों के नृशंस कत्ल और दो करोड़ लोगों के बेघर हो जाने की त्रासदी को एक संवेदनशील शायर ‘आजादी’ के अर्थ में नहीं ले पाया था। ‘आज के इस इंसान को यह क्या हो गया’ या ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान’– आजादी के पहले दशक में कवि प्रदीप के लिखे इन गीतों में एक ओर जहां विभाजन के संत्रास की परछाइयां साफ नजर आती हैं तो दूसरी ओर व्यक्ति के नैतिक पतन पर शर्मिंदगी और नाराजगी का इजहार भी हुआ है ।

राजनीतिक आजादी मिल जाने के बावजूद एक टीस थी जो पंजाब के हिंदुओं-सिखों और मुसलमानों के मन में देर तक उठती रही थी, और क्योंकि दुख का चेहरा दोनों तरफ एक जैसा था, इसीलिए ‘चढ़दे’ और ‘लैहंदे’ दोनों पंजाबों का पंजाबी-उर्दू-हिंदी का साहित्य उस संताप को गहनता के साथ संजोए हुए है। कब, किस तरह का देशप्रेम अपना असर दिखाता है, शायद यह इंसान की मन:स्थिति और परिस्थिति पर निर्भर करता है। युद्ध जैसे माहौल में इंकलाबी और जोशीले गीतों को सुनना अच्छा लगता है। मुझे याद है कि उन्नीस सौ बासठ में भारत-चीन युद्ध के समय साहिर लुधियानवी ने एक जोशीला गीत लिखा था -‘वतन की आबरू खतरे में है, होशियार हो जाओ।’ तब रेडियो के पास बैठीं हम सहेलियां भी जोश में आकर रफी साहब की आवाज में आवाज मिलाया करती थीं।

अभी तेरह अगस्त को विविध-भारती का शनिवारीय ‘पिटारा’ देशभक्ति के सहज-सरस अनुरागी गीतों से भरा था। ‘आनंदमठ’ के ‘वंदेमातरम’ के साथ खुल कर मीठे गीतों की झड़ी-सी लगा गया । ‘सन आॅफ इंडिया’ का बालगीत ‘नन्हा-मुन्ना राही हूं’ अपनी पूरी लंबाई के साथ सुनने को मिला। हेमंत कुमार का ‘इंसाफ की डगर पे’, मुकेश का ‘जिस देश में गंगा बहती है’, मन्नाडे का ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’ और मुहम्मद रफी का ‘अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है’।
अब तो यही दुआ है कि शहादतों और कुरबानियों का सिलसिला इतिहास की बात हो जाए। सुरक्षा-कवचों में दुबके, बड़ी-बड़ी बातें बनाने वाले बड़े लोग, बेगुनाह आम इंसानों और सरहदों के प्रहरियों की जान की भी कीमत समझें और युद्ध के आह्वान जैसी अपनी वाणी पर जरा संयम रखें।

शोभना विज, पटियाला


किसका हित
बाल मजदूरी पर नया कानून आया है जो 1986 में बने कानून का स्थान लेगा। नया कानून कहता है कि छह से चौदह वर्ष के बच्चे स्कूल से घर लौट कर किसी ‘पारिवारिक उद्यम’ में हाथ बंटाएं तो इसे मजदूरी नहीं माना जाएगा! यानी नए कानून ने बच्चों से मजदूरी कराने के वैध रास्ते खोल दिए हैं। सोचें, संसद किसके हित में काम करती है!

रोहित रमण, पटना विश्वविद्यालय


घातक चिंगारी
प्रधानमंत्री के बलूचिस्तान और गिलगित के संबंध में दिए बयान ने न केवल भारत के लोगों बल्कि पाकिस्तान सहित संसार भर को हैरान कर दिया है। विश्लेषक इस संबंध में फूंक-फूंक कर विश्लेषण कर रहे हैं। इस बयान के कई प्रभाव पैदा हो सकते हैं और यह पूर्वानुमान लगा पाना बहुत मुश्किल है कि विश्व समुदाय इसे किस प्रकार लेगा, विशेषकर पाकिस्तान।

भारत यदि इसे पाकिस्तान पर दबाव बनाने के कारगर उपाय के रूप में देखता है तो संभव है भविष्य में वह चीन पर दबाव बनाने के लिए तिब्बत की आजादी की मांग को भी अपना समर्थन देने का प्रयास करे। यह विचार ही कान खड़े कर देने वाला है। भारत में अलगाववादी प्रवृत्तियों को यदि पड़ोसी देश दमन और आजादी की मांग के रूप में समर्थन देने लगे तो क्या भारत ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार है? भारत ने शायद जल्दबाजी में ऐसी नीति का रुख अपना लिया है जो उसके लिए लंबी अवधि में महंगी पड़ सकती है।

दक्षिण एशिया की हवाएं इस नीति के अनुकूल नहीं मालूम होती हैं। उधर पाकिस्तान ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वह विश्व स्तर पर कश्मीर मुद्दे को उछालने में कसर नहीं थोड़ेगा। ऐसे में जबकि कश्मीर घाटी बवंडर से घिरी हुई है, यह चिंगारी घातक साबित हो सकती है। भारत को इस संबंध में गंभीरता से कदम उठाते हुए अपनी विदेश नीति को विश्व समुदाय के समक्ष और अधिक स्पष्ट करने की जरूरत है।

घनश्याम कुमार ‘देवांश’, नई दिल्ली


नीति की जरूरत
बड़े खेल आयोजनों में विजयी होने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कृत करना एक अच्छी परंपरा है। लेकिन इसमें भेदभाव न हो, इसके लिए कोई नीति अवश्य बनाई जानी चाहिए कि किस प्रकार की विजय या पदक पाने पर पुरस्कार राशि कितनी होगी और क्या अन्य सुविधाएं दी जाएंगी? आश्चर्य की बात है कि एक खिलाड़ी ने जब कांस्य पदक जीता तो हरियाणा सरकार ने बिना सोचे-समझे उसे नौकरी देने की बात कही, जबकि वह रेलवे में कार्यरत है। नकद पुरस्कारों की अब जो वर्षा की जा रही है यदि उस राशि का सदुपयोग खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने में किया जाता तो रियो ओलंपिक में अधिक पदक आ सकते थे।

इसी प्रकार अनेक मामलों में मुआवजा देने में भी भेदभाव किया जाता है। किसी को करोड़ों, किसी को लाखों और किसी को हजारों में। इसकी भी स्पष्ट नीति बने और उसके अनुसार ही भुगतान हो। बल्कि अच्छा तो यह होगा कि प्रभावित व्यक्ति को जीवन पर्यंत मासिक आधार पर भुगतान हो।

यश वीर आर्य, देहरादून

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