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इंसानों और रिश्तों से ज़्यादा पैसों और वर्चस्वता की क़ीमत

जिस ईमानदारी के साथ पहले ग़रीब, कमज़ोर और शोषित तबक़ों के साथ न्याय होता था वो आज ख़त्म हो चूका है।
Author June 20, 2017 07:42 am
प्रतीकात्मक चित्र।

आज बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन कुछ चीज़ें है जो लिखने से रोकती है, कुछ अपनों को खोने का डर जिन्हें पहले ही खो चुका हूँ। कुछ है जो हमेशा से मुझे अंदर से झकझोरता रहा है जो पिछले कुछ सालों से अपनी बेबसी के कारण और भी ज़्यादा बढ़ गया है। लेकिन फिर भी हिम्मत जुटा रहा हूँ कि कुछ बातें तो कह देनी ही चाहिये। आज लिखने को मजबूर हूँ क्यूँकि वक़्त की ज़रूरत है। सबलोग देश विदेश की राजनीति पर हमेशा लिखते है, मैं ख़ुद भी अक्सर देश विदेश के मुद्दों पर लिखता रहा हूँ। लेकिन आज हमलोग राजनीतिक मुद्दों में इतने व्यस्त हो चुके है कि अपने आस पास की राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर विचार विमर्श करने का समय ही नहीं है।

आज मैं अपने आसपास के राजनीतिक तथा सामाजिक गलियारें के बारे में लिखने जा रहा हूँ। आज जब अपने आस पास देखता हूँ तो महसूस करता हूँ बहुत कुछ बदल गया है। अपने गाँव, समाज और आसपास के मुहल्लों को देखकर घुटन होती है, यह घुटन यहाँ के बुनियादी ढांचा परिवर्तन से ज़्यादा सामाजिक बदलाव को देखकर होती है। ऐसा तो नहीं था मेरा गाँव पिछले कुछ साल पहले तक। सामाजिक न्याय का गला घोंटकर हमने उसको हाशिए पर रख दिया है। हर कोई एकदूसरे को गिराने और नीचा दिखाने में लगा हुआ है। आजकल हर कोई अपने से कमज़ोर को सताने का कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं देता। हर धर्म, जाति और वर्ग में कुछ लोग है जिनका अपने लोगों के उपर पूरा नियंत्रण है जो उनको डरा धमका कर उनसे जाति और धर्म के नाम पर वोट लेते है और ज़रूरत पड़ने उनके साथ बदसलूकी और मारपीट करने से भी बाज़ नहीं आते। यह वो लोग है जो चुनाव के समय एक दूसरे का जमकर विरोध करेंगे लेकिन बाद में एक साथ बैठकर रंगरेलिंया मनाते हुए मिल जाएँगे।

जिस ईमानदारी के साथ पहले ग़रीब, कमज़ोर और शोषित तबक़ों के साथ न्याय होता था वो आज ख़त्म हो चूका है। उसकी भी कई सारी वज़हें है, आज हमलोग अपने रिश्ते और पहचान को न्याय से उपर महत्व देते है। “जिसकी लाठी उसकी भैंस” कहावत आज चरितार्थ है। हमारे सामने इंसानों और रिश्तों से ज़्यादा पैसों और वर्चस्वता की क़ीमत है। यह बदलाव सिर्फ़ उनलोगों की वजह से आया जो अपने आपको दबंग मानते है और अपनी दबंगई दिखाने के चक्कर में हर तरह के ज़ुल्म करते है और ग़रीबों का हक़ चाटने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। इन्हें दूसरों की विचारधाराओं से भी नफ़रत है, अगर आपके विचार इनसे नहीं मिलते तो आप इनकी आँखों में खटकने लगते है। यह भूल गये है कि इंसान मरता है लेकिन विचारधारा कभी ख़त्म नहीं होती। अचानक से आज मुझे कॉमरेड चंद्रशेखर याद आ गए सिवान में जो चिंगारी उन्होंने ने जलायी थी वो आज भी उनके मरने के बाद जल रही है। चाटूकारिता की हदें इतनी है कि इनके सामने इंसानों की क़ीमत नहीं है। यह भूल जाते है कि वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता है, वो दिन ज़रूर आएगा जब आप हाशिये पर होंगे और आपके साथ वही होगा जो आपने ग़रीबों के साथ किया है। अगर सरल भाषा में कहूँ तो यह लोग दबंग नहीं दलाल कह लाएँगे। ग़रीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, विकास, घूसख़ोरी जैसे मुद्दे पर बात नहीं होती। इनका ख़ून अनन्याय के ख़िलाफ़ नहीं खौलता, इनका ग़ुस्सा सिर्फ़ ग़रीबों पर फूट्टा है।

बातें तो बहुत है लेकिन समय आने पर लिखता रहूँगा। इनको इनकी भाषा में जवाब नहीं दे सकता लेकिन अपनी क़लम से इनको इनके कारनामे याद दिलाता रहूँगा। आप सभी लोगों से आग्रह है देश-विदेश के साथ अपने आसपास के मुद्दों पर भी लिखें। आज अपनी बात को खुले तौर पर नहीं लिख सका लेकिन आने वाले समय में ज़रूर लिखूँगा।

काविश रेज़ा (दरभंगा, बिहार)

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