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चौपाल : खेती की खातिर

ये आंकड़े खेती के प्रति घटते रुझान को दर्शाते हैं। यह बात ज्यादा चिंताजनक इसलिए है कि आने वाले दौर में जब विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियां कम होंगी तो कृषि ही सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर प्रदान करने वाला क्षेत्र होगा। लेकिन भारत में जिस प्रकार लोग खेती छोड़ रहे हैं वह बहुत चिंताजनक है।

Author February 5, 2018 6:39 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Express Photo)

देश में शिक्षा की स्थिति पर सालाना रिपोर्ट (असर) 2017 में शिक्षा के खराब स्तर की बात तो कही गई है लेकिन खेत्कृषि शिक्षा की पूरी तरह उपेक्षा कर दी गई है। किसानों की बदहाली पर एक के बाद एक आंदोलन देखने को मिले हैं कभी तमिलनाडु, कभी महाराष्ट्र तो कभी मध्यप्रदेश में। इतनी राजनीतिक सक्रियता के बाद भी किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता है। ‘असर’ रिपोर्ट बताती है कि 78 फीसद ग्रामीण बच्चे कृषि कार्यों में नहीं जाना चाहते हैं। उसके मुताबिक 14 से 18 वर्ष के बालक जो अभी पढ़ रहे हैं वे अपनी जमीन पर काम नहीं करना चाहते। यह बताता है कि आने वाले समय में भारत के शहरों पर कितना बोझ पड़ने वाला है।

जब सरकारें स्किल (दक्षता) की बात कर रही हैं तो उनका जोर खेती पर कतई नहीं है जबकि सबसे ज्यादा अनस्किल्ड (दक्षता रहित) व्यक्ति वहां कार्यरत हैं। असर की ही रिपोर्ट में एक रोचक तथ्य यह मिलता है कि 2014-2015 में एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 16,461 थी तो वहीं एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 14,659 थी। ये आंकड़े खेती के प्रति घटते रुझान को दर्शाते हैं। यह बात ज्यादा चिंताजनक इसलिए है कि आने वाले दौर में जब विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियां कम होंगी तो कृषि ही सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर प्रदान करने वाला क्षेत्र होगा। लेकिन भारत में जिस प्रकार लोग खेती छोड़ रहे हैं वह बहुत चिंताजनक है।

भारत में कृषि एक परंपरागत व्यवसाय रहा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है। इसमें सरकारों या किसी भी प्रकार कीसंस्था द्वारा दक्षता को जोड़ने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। सरकारें और भारतीय राजनीतिक दल अभी सिर्फ कर्ज के मुद्दे पर अटके हुए हैं। यह सरकार बनाने या गिराने के काम तो आ सकता है पर इससे किसानों का उद्धार नहीं हो सकता। अगर किसान पैसों का सही प्रबंधन सीख जाएं तो यह कार्य संभव है। प्रबंधन भी दक्षता से ही जुड़ा मसला है। मोदी सरकार मृदा परीक्षण के लिए ‘स्वॉयल हेल्थ योजना’ लेकर आई है। इसके स्थान पर किसानों को खुद परीक्षण करने का प्रशिक्षण दिया जा सकता था। अब भी सरकारें किसानों को दक्ष बनाने की भूमिका निभाने को तैयार नहीं हैं। हम किसानों की बात तो करते हैं लेकिन यह सब खानापूर्ति तक सीमित है। किसानों की दशा सुधारने के लिए इसमें अमूल चूल परिवर्तन की जरूरत है। हमारी सरकारें ऐसा महौल बनाने में नाकाम रही हैं कि भावी पीढ़ी कृषि क्षेत्र में आने की हिम्मत कर सके। यह देश के लिए खतरनाक है।
’रजत सिंह, जौनपुर

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