ताज़ा खबर
 

जनसत्ता चौपाल : नींव पर चोट

हमारे देश में शिक्षा हमेशा सत्ता से संचालित होती आई है। जब हम खुद को बौद्धिकता की पराकाष्ठा पर कहते हुए गर्व करते हैं तो भी हमारी सारी शिक्षण व्यवस्था और शिक्षण संस्थाएं उसी राजसत्ता के पैरों की घुंघरू बनी नजर आती हैं।

Author नई दिल्ली | July 21, 2016 7:06 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हमारे देश में शिक्षा हमेशा सत्ता से संचालित होती आई है। जब हम खुद को बौद्धिकता की पराकाष्ठा पर कहते हुए गर्व करते हैं तो भी हमारी सारी शिक्षण व्यवस्था और शिक्षण संस्थाएं उसी राजसत्ता के पैरों की घुंघरू बनी नजर आती हैं। सत्ता जब चाहे तब अपने हिसाब से ज्ञान बांटती रही है। हमारी पीढ़ी जवाहरलाल नेहरू को आदर्श महापुरुष मानती आई है। अब अकबर महान नहीं, महाराणा प्रताप महान होंगे और नेहरू से अधिक सावरकर को याद किया जाएगा। राजस्थान में बच्चों को अब यही पढ़ाया जाएगा। पाठ्यक्रमों में इस बदलाव का मकसद भी साफ है कि भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का जो नारा दे रही है उसमें पाठ्यक्रमों में बदलाव कर आने वाली पीढ़ी के दिमाग से नेहरू, इंदिरा और कांग्रेस के कई नेताओं की छवि को पूर्णत: मिटा देना है। इसके साथ ही सावरकर जैसे आरएसएस की विचारधारा मानने वाले नेताओं की छाप बच्चों में डाल कर उनके मानस को हिंदुत्ववादी बनाना है।
इसका पूरा खाका तैयार किया जा चुका है।

बार-बार नेताओं द्वारा यह कहा जाता है कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, उन्हें अपनी पढ़ाई-लिखाई और भविष्य बनाने के बारे में ही सोचना चाहिए। लेकिन क्या शिक्षा में लगातार राजनीतिक हस्तक्षेप को सही ठहराया जा सकता है? चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर बच्चों के बीच रखने का काम न तो उनकी शैक्षणिक सेहत के लिए सही है और न जनमानस के लिए। लेकिन भाजपा इस परंपरा को और उग्र रूप में लोगों के बीच रख रही है। यह खतरनाक संकेत है। जहां तक नेहरू और अकबर का प्रश्न है, मेरा मानना है कि हो सकता है कई खामियां नेहरू में रही हों, लेकिन देश के लिए उनकी देन को झुठलाया नहीं जा सकता।

औद्योगिक क्रांति की बात हो या तत्कालीन प्रभावशाली सोवियत संघ के साथ अन्य देशों से संबंध, नेहरू ने सफल भूमिका निभाई। हां, पकिस्तान और चीन के साथ संबंध बेहतर करने में वे जरूर विफल रहे। इसमें कोई दो राय नहीं कि महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रभक्त और त्यागी महापुरुष के बारे में भी बच्चों को जानकारी मिलनी चाहिए, लेकिन एक को समाप्त कर दूसरे को स्थापित करने की मानसिकता समझ से परे है। अकबर के हिंदू-मुसलिम एकता के विचारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। भारतीय संस्कृति की नींव गंगा-जमुनी संस्कृति ही रही है। सिर्फ सत्ता के लिए इस नींव पर चोट करना घातक और भारतीयता के विरुद्ध है।

अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App