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चौपाल- नोटबंदी के बावजूद

पिछले साल आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई नोटबंदी ने देश की जनता ही नहीं बल्कि तंत्र, राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी हिला कर रख दिया था।

Author November 8, 2017 5:49 AM
मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले को एक महीना हो चुका है। लेकिन अभी तक बैंकों और एटीएम के बाहर लाइनें कम नहीं हुई है। (Photo:PTI)

नोटबंदी के बावजूद

पिछले साल आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई नोटबंदी ने देश की जनता ही नहीं बल्कि तंत्र, राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी हिला कर रख दिया था। 500 और 1000 रुपए के नोट बंद कर 500 व 2000 के नए नोट बाजार में उतारे गए। आज एक वर्ष पूरा होने के बाद मुद्दा सिर्फ इतना है कि सरकार का यह कदम अपने मकसद साधने में सफल प्रयास साबित हुआ या नहीं? इसमें संदेह नहीं कि नोटबंदी के एक साल बाद भी कोई खासा बदलाव देखने को नहीं मिला है। इस बीच हालांकि डिजिटल भुगतान के काफी सूत्र बाजार में आए जैसे भीम, यूपीआई, मोबाइल वॉलेट, पेमेंट बैंक्स आदि, पर आज भी 1,31,81,190 करोड़ रुपए नगद बाजार में चल रहे हैं। देश में तीन करोड़ क्रेडिट कार्ड व 70 करोड़ डेबिट कार्ड हैं। इनके बावजूद लोग नकद लेन-देन को ही प्राथमिकता देते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अनुसार नोटबंदी लागू होते ही डिजिटल भुगतान में अचानक खासा इजाफा देखने को मिला लेकिन फिर जैसे ही बाजार में नकदी वापस आई, डिजिटल माध्यमों का उपयोग एकदम से कम हो गया। हालांकि उसके बाद यह धीरे-धीरे बढ़ रहा है पर अभी तक उस ऊंचाई को नहीं छू पाया जिसे पिछले वर्ष दिसंबर में छुआ था। नवंबर 2016 में डेबिट व क्रेडिट कार्ड से लगभग 35,240 करोड़ का भुगतान किया गया। यह दिसंबर में बढ़ कर 52,220 करोड़ रुपए हुआ और फरवरी 2017 में बाजार में भरपूर नकदी आ जाने से यह गिर कर 39,150 करोड़ रुपए रह गया। उसके बाद लगातार धीमी गति से बढ़ कर यह आकड़ा सितंबर 2017 में 47,820 करोड़ रुपए हो गया है।

निस्संदेह सरकार, निजी व गैर सरकारी संस्थान डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने के लिए भरपूर प्रयास कर रहे हैं और कुछ हद तक सफल भी हुए हैं, पर अब भी देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इन सबसे काफी दूर है। सिंगापुर, नीदरलैंड्स, फ्रांस, स्वीडन, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों की अर्थव्यवस्था में 50 फीसद से आधिक भुगतान डिजिटल माध्यम से किया जाता है। भारत जैसे देश में ऐसे बहुत से कारण हैं जिनके चलते डिजिटल भुगतान ज्यादा सफल नहीं है। जानकारी की कमी, नकद लेन-देन की आदत, मुश्किल प्रक्रिया, सुरक्षा कारण आदि कारणों के चलते भारत में अभी तक दो से चार फीसद भुगतान ही नकद-रहित होता है।नोटबंदी को जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताना बिल्कुल गलत होगा, क्योंकि मौजूदा सरकार के आने के बाद से स्थिति को देखा जाए तो सब कुछ योजनाबद्ध नजर आएगा। पहले हर व्यक्ति का बैंक में खाता खोला गया, आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया गया, डिजिटल इंडिया के माध्यम से लोगों को जागरूक किया गया, फिर आरबीआई गवर्नर को बदला गया और उसके बाद नोटबंदी की गई। नतीजतन, नोट बदलवाने के लिए सबके पास बैंक खाते थे, लोग भुगतान के लिए डिजिटल माध्यमों को जानते थे और गवर्नर सरकार के अनुसार काम कर रहे थे। इसके बाद लंबे अरसे से अटका हुआ जीएसटी बिल भी नोटबंदी के छह महीने बाद पारित कर दिया गया। इंटरनेट के इस्तेमाल में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश में विकास तो हो रहा है पर नोटबंदी अपने मकसद में कितनी सफल रही यह दीर्घकाल में ही पता चलेगा।
’हृदय गुप्ता, मोहाली, चंडीगढ़

चीन की चिढ़
चीन ने भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के अरुणाचल प्रदेश दौरे पर आपत्ति जताई है। वह भूल रहा है कि भारत एक स्वतंत्र देश है। वह कई बातों पर इस तरह नाराजगी जताता है मानो भारत चीन का गुलाम है। हमें वही करना चाहिए जो देश की रक्षा के लिए उपयुक्त है। अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। यह बात चीन को पहले से चुभ रही है। इसलिए उस राज्य में कुछ भी अलग गतिविधियां होती हैं तो भारत को दो-चार बातें सुनाए बिना चीन को चैन नहीं आता। लेकिन भारत इस तरह के दबाव में आने वाला नहीं है। किसी भी मामले को लेकर त्यौरियां चढ़ा लेना चीन की बुरी आदत है और उसकी इस आदत में कभी सुधार आने वाला नहीं है। हमें परेशान करने के लिए पाकिस्तान की मदद करने वाले ड्रैगन से हमेशा सचेत रहना जरूरी है।
’अमित पडियार, मुंबई

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