जनसत्ता चौपाल : दलित हुंकार - Jansatta
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जनसत्ता चौपाल : दलित हुंकार

पिछले कुछ दिनों से देश के कई हिस्सों में दलित उत्पीड़न की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। दलितों के आत्मसम्मान और जीने के अधिकार पर निर्मम आघात किए गए हैं।

Author नई दिल्ली | August 18, 2016 3:55 AM
मंगलवार को गुजरात के रेजिडेंट कमिश्नर को ज्ञापन दिया।

पिछले कुछ दिनों से देश के कई हिस्सों में दलित उत्पीड़न की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। दलितों के आत्मसम्मान और जीने के अधिकार पर निर्मम आघात किए गए हैं। आजादी के सत्तरवें साल में भी बारंबार सामने आती ऐसी घिनौनी घटनाएं न केवल मानवता को शर्मसार कर रही हैं बल्कि सामने आ रही सरकारी उदासीनता सामाजिक समानता के संवैधानिक अधिकार पर बार-बार चोट कर उसका मखौल उड़ा रही है। जिस राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बाराबरी की संकल्पना हमारे संविधान में की गई है, वर्चस्वशाली लोग उसकी धज्जियां बार-बार उड़ा रहे हैं। कानून का राज कहीं नजर नहीं आता है। असल में तो प्रशासन कहीं न कहीं ऐसे तत्त्वों के सहयोग में ही खड़ा नजर आता है। गुजरात के उना में हुई दलित उत्पीड़न की घटना ने न केवल गुजरात मॉडल की पोल खोल कर रख दी बल्कि सत्तारूढ़ भाजपा के ढोंगी चेहरे को भी बेनकाब किया है। जिस ‘नीच’ शब्द को बार-बार उछाल कर आमजन की सहानुभूति बटोरने की तिकड़म में नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनावों में सफल रहे, वही अपने गृह प्रदेश में घटित इस घिनौनी हरकत पर महीने तक मौन साधे रहे। जब प्रतिरोध कार्रवाइयां घनी हुर्इं तो न सिर्फ अपनी मुख्यमंत्री आंनदीबेन को बदलना पड़ा बल्कि यह कहना पड़ा कि ‘गोरक्षा का चोला पहने अस्सी फीसद लोग रात में गलत काम करते हैं।’ लेकिन उना में तो कथित गोरक्षकों ने मरी हुई गाय की खाल उतारते निरीह दलितों की पिटाई तो धौले दोपहरे की थी!

पंद्रह अगस्त आजादी के दिन उना में सामने आई दलितों की एकता और चेतना मानवता-विरोधी इन शक्तियों के खिलाफ मोर्चेबंदी की एक नई आस अवश्य जगा गई है। उना में पंद्रह अगस्त 2016 और इससे पूर्व अमदाबाद में हुई दलित महापंचायत में मैला और मरे जानवरों को न उठाने के संकल्प के साथ हर दलित परिवार को पांच एकड़ जमीन या वैकल्पिक रोजगार की मांग निश्चित ही उनकी नासूरी जिंदगी में नरगिसी रंग भरने की पहल है। यह बात दूसरी है कि इसे कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ने में कितनी देर लगेगी, यह तो जनसमर्थन की ताकत और समय ही बताएगा पर एक नई सुबह की किरण जरूर दिख गई है।

जब से भाजपा सत्तारूढ़ हुई अंधविश्वास और धर्म का पाखंड को ज्यादा बल मिला है। इसके कार्यकर्ताओं, विधायकों, सांसदों और मंत्रियों के बेशर्मीभरे सूरमाई बयान आग में घी डालते हैं। दलित और मुसलिम इनके निशाने पर हैं। राजस्थान में भी यह पाखंड गुजरात से कम नहीं है। महिलाओं को डायन और ‘ऊपरी हवा’ उतारने के नाम पर खौफनाक यातनाएं दी जाती हैं। भूत-प्रेत उतारने के नाम पर सिर पर जूते, मुंह में जूते, लोहे की सांकलों से पिटाई और जूते से पानी पिलाने की घटनाएं मानवता को शर्मसार करती रही हैं। ये सारी घटनाएं धर्म के नाम पर सरेआम होती हैं। लेकिन ये भूत-प्रेत और ‘ऊपरी छाया’ महिलाओं पर ही क्यों आती है, पुरुषों पर क्यों नहीं? घरेलू उत्पीड़न और अवसाद की शिकार महिलाओं की बोलती बंद कराने के ये अघोरी नुस्खे मानवता पर कलंक हैं लेकिन धार्मिक पाखंड की आड़ में खूब फलफूल रहे हैं। सरकार अपने दायित्व बोध से बेखबर इन्हें पोसने में रत है।

रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर


नशे की गिरफ्त
हमारी युवा पीढ़ी दिन प्रतिदिन नशे के दलदल में धंसती जा रही है। इसका प्रभाव स्कूल-कॉलेजों तक में खूब देखने को मिलता है। गांव के लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। यहां तक कि महिलाएं भी इस समस्या से पीड़ित हैं। नशीली दवाइयां, कैफीन, अफीम आदि दुकानों पर आसानी से कम दामों में उपलब्ध हो जाती हैं। नशीले पदार्थों के सेवन से व्यक्ति कैंसर, दमा आदि बीमारियों की जकड़ में आ जाते हैं। सरकार ने इसकी रोकथाम के लिए नशा मुक्ति केंद्र और अन्य संस्थाए बनाई हैं जो लोगों को नशे के प्रति जागरूक करती हैं। लेकिन इन संस्थाओं का प्रयोग नाममात्र का रह गया है। देश की युवा पीढ़ी ने नशे की होड़ में खुद को बरबाद कर लिया है, लिहाजा नशीले पदार्थों की सप्लाई पर तुरंत सख्त प्रतिबंध लगाना चाहिए।

साक्षी गुज्जर, यमुनानगर


दोमुंही आप
आम आदमी पार्टी का दोमुंहा चेहरा सामने आया है। पंजाब में वह नशे के विरोध में ताल ठोंक रही है, पर स्वयं द्वारा प्रशासित दिल्ली में नशे का प्रसार कर रही है। एक आरटीआई के जवाब से जाहिर हुआ कि 15 फरवरी 2015 को सत्ता संभालने के बाद से 5 जुलाई 2016 तक लगभग डेढ़ वर्ष में उसने 72 दुकानों और 217 रेस्तरांओं को नए शराब लाइसेंस जारी किए। यानी कुल 289 नए ठिकाने शराबखोरी के लिए उसने उपलब्ध करा दिए- हर दूसरे दिन एक नया लाइसेंस! स्पष्ट है कि पंजाब में उसका नशा-विरोध एक राजनीतिक नाटक है।
अजय मित्तल, खंदक, मेरठ


बलूचिस्तान के बजाय
प्रधानमंत्री मोदी के बलूचिस्तान पर बयान के बाद चर्चा होने लगी है कि भारत को बलूच आंदोलन का समर्थन करना चाहिए। मीडिया के एक तबके ने तो इसे भारत की नई पाक नीति तक कह दिया है। भारत को बलूचिस्तान का मुद्दा नहीं उठाना चाहिए क्योंकि वहां हिंसक अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। यदि भारत ऐसा करता है तो इससे संदेश जाएगा कि वह अलगाववाद और हिंसा का समर्थन करता है। साथ ही बलूच समस्या के पीछे भारत का हाथ होने के पाक के आरोप को भी बल मिलेगा।

ऐसा करने से भारत और पाक में क्या अंतर रह जाएगा? पाक भी तो कश्मीर में हिंसक अलगाववाद को ही बढ़ावा दे रहा है। पाक की कश्मीर में की जाने वाली गलती को हम बलूचिस्तान में दोहरा कर क्या सही करेंगे? महात्मा गांधी ने कहा था कि एक की गलती को दूसरा दोहरा कर उसे गलत नहीं बल्कि सही साबित करता है। कुछ लोगों का कहना है इससे पाक पर दबाव पड़ेगा। इसमें संदेह है क्योंकि जब पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के मसले पर पाक नहीं सुधरा तो क्या बलूचिस्तान से उस पर कुछ फर्क पड़ेगा? भारत को बलूचिस्तान पर ध्यान देने के बजाय कश्मीर, पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साईचिन पर ध्यान देना चाहिए।

ललित मोहन बेलवाल, गौलापार

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