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चौपाल- कठिन समय

इस उम्र के बाल मन को कोरा कागज की संज्ञा दी गई है, फिर उसमें अपराध का जन्म कहां से हो रहा है?

Author January 22, 2018 02:30 am
इसी रेयान स्कूल में 8 साल के प्रद्युम्न की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। (File Photo)

कठिन समय 

लखनऊ के स्कूल की घटना ने गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल की वारदात की याद दिला कर झकझोर दिया। आखिर क्या कारण है कि हमारे बच्चों में परीक्षा और पढ़ाई के प्रति इतना भय व्याप्त है? महज स्कूल बंद कराने के लिए किसी मासूम की जान लेने की कोशिश और वह भी सातवीं कक्षा की एक बच्ची द्वारा! बच्चों में यह हत्यारी प्रवृत्ति कहां से आ रही है?
इस उम्र के बाल मन को कोरा कागज की संज्ञा दी गई है, फिर उसमें अपराध का जन्म कहां से हो रहा है? शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों ने कुछ ठोस उपाय खोज कर इसका तत्काल निदान नहीं निकाला तो यह रोग नासूर का रूप ले लेगा और तब हमारे पास सिवाय हाथ मलने के, कुछ नहीं रह जाएगा। जब इस तरह की कोई घटना होती है तो बच्चों में उसके अनुकरण की मानसिकता पनपने लगती है। बच्चे आपस में इसे मजाक का विषय भी बनाने लगते हैं।
इधर पंद्रह से बीस वर्षों में स्कूली छात्रों में संस्कारों का जो अवमूल्यन हुआ है वह चिंताजनक है। माता-पिता, भाई-बहन, छोटे-बड़े, आस-पड़ोस के प्रति बच्चों में जितनी संवेदनशून्यता आई है वह निश्चित ही समाज के लिए घातक सिद्ध हो रही है। हमारे स्कूली जीवन में इस तरह की घटना कल्पना से परे थी, पर आज का बच्चा इतना हिंसक और आक्रामक हो गया है कि महज विद्यालय बंद कराने के लिए किसी मासूम की बेरहमी से हत्या कर सकता है और उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। यह कठिन समय है और शिक्षकों व अभिभावकों को अपने बच्चों पर विशेष नजर रख कर उन्हें हिंसक मानसिकता से बचाना चाहिए।
’सुशील कुमार शर्मा, विश्वास पार्क, नई दिल्ली

शिक्षित या अशिक्षित
समाज में बहुत-से ऐसे लोग मिल जाते हैं जो खुद को बहुत पढ़ा-लिखा मानते हैं लेकिन उनकी हरकतों से लगता है कि वे शिक्षित होकर भी अशिक्षित ही हैं। शुरुआत करते हैं सामाजिक बुराइयों से। हमारे देश में सबसे बड़ी और शर्मनाम सामाजिक बुराई कन्याभ्रूण हत्या है। इसके लिए महज अनपढ़ या गरीब लोग जिम्मेवार नहीं हैं बल्कि कुछ पढ़े-लिखे लोग भी इस वैज्ञानिक सदी में रूढ़िवादी विचारधारा में जी रहे हैं। इसी के साथ दहेज प्रथा, छुआछूत, जातपांत आदि सामाजिक बुराइयां केवल अशिक्षित लोगों के कारण नहीं बढ़ी हैं बल्कि इनके लिए वे लोग भी काफी हद तक जिम्मेवार हैं जो अपने आपको ज्यादा पढ़ा-लिखा समझते हैं। किसी लालच में आकर हर चुनाव में अपना कीमती वोट ‘बेचने’ वालों का आंकड़ा शिक्षित वर्ग का भी कोई कम नहीं होगा। इसी तरह कानूनों का पालन न करने में भी शिक्षित तबका अकसर आगे रहता है, मसलन हेलमेट न लगाना, लालबत्ती पर न रुकना, कार चलाते हुए मोबाइल पर बात करना। इसी तरह बात-बात में अपशब्दों का प्रयोग करना भी कुछ पढ़े-लिखे अपनी शान समझते हैं।
शिक्षा का मतलब केवल किताबी ज्ञान नहीं है। नैतिकता और आसपास की अच्छी बातों के साथ-साथ इंसानियत का ज्ञान होना भी बहुत जरूरी है। असली पढ़ा-लिखा इंसान वही समझा जाता है जिसके अंदर नैतिकता की भावना हो, इंसानियत हो, जो समाज में अच्छी शिक्षा का प्रसार करे और अच्छी तरह खुद जिए और लोगों को भी अच्छी तरह जीने की सलाह दे।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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