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जनसत्ता चौपाल : किसके सगे

हुर्रियत के अलगाववादी नेताओं से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि बुहरान वानी आप में से किसी की संतान क्यों नहीं था? दरअसल, होता यही है।

Author नई दिल्ली | July 21, 2016 7:08 AM
पुंछ के जिस इलाके में पोस्टर दिखे वो कश्मीर पंडित बहुल इलाका है। (फाइल फोटो)

हुर्रियत के अलगाववादी नेताओं से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि बुहरान वानी आप में से किसी की संतान क्यों नहीं था? दरअसल, होता यही है। आंदोलनकारी अथवा जिहादी नेताओं के खुद के बाल-बच्चे प्राय: विदेशों में या दूसरी जगहों पर रहते हैं। वे उन्हें उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजते हैं और वहां वे अच्छी नौकरियां भी करते हैं। अपनी कीमती जानें खामख्वाह बेचारे मासूम और गुमराह नौजवान गंवाते हैं। जिहाद पर उतारू कश्मीर के नवयुवकों को अपने नेताओं के इस दोहरे-दोगले आचरण पर गौर करना चाहिए।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर


अच्छे दिन
यह बहुत अफसोसनाक है कि इन दिनों देश के सकल घरेलू उत्पाद का करीब-करीब सारा हिस्सा बाजार के इन बिचौलियों के हाथ जा रहा है। बढ़ी विषमता में मेहनत करने वालों की आर्थिक स्थिति बदतर हुई और सट्टेबाजारियों की पौ-बारह है। दालों के दाम बढ़ने से दाल खपत 67 ग्राम से घट कर 45 ग्राम प्रतिव्यक्ति रह गई है। सब्जियों और दालों के बढ़े दामों के चलते कम हुई क्रयशक्ति ने प्रतिव्यक्ति जरूरी प्रोटीन की मात्रा घटा दी है।

एक तरफ महंगाई की मार तो दूसरी तरफ मजदूरी में कमी ने आमजन के बीच अभावों को बढ़ा दिया है। श्रम कानून नियोक्ताओं के हित में बदल दिए हैं। मजदूरी व सुविधा बढ़ाने के लिए मोल-भाव की उनकी पूर्व स्थिति खत्म कर दी है। मजदूर की सुनवाई न होने के कारण उसे जुल्म सहते हुए कम मजदूरी में ज्यादा काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। श्रम कानूनों से छूट पाकर प्रशिक्षु के बहाने नाममात्र की मजदूरी पर नए मजदूर का शोषण करने की मालिकों की प्रवृत्ति पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। रोजगार के वादे के विपरीत नई भर्तियां बंद कर ठेके के जरिए सरकार खुद श्रमिकों का शोषण करने से बाज नहीं आ रही। यह कितना शर्मनाक है कि मनरेगा मजदूरों की बकाया 12,330 करोड़ रुपए की राशि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से जारी हुई। क्या इन्हीं अच्छे दिनों का वायदा भाजपा ने देशवासियों से किया था?

रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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