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चौपाल: हिंदी के साथ

Hindi Diwas 2018: उनहत्तर वर्ष बीतने और ग्यारह विश्व हिंदी सम्मलेन आयोजित करने के बावजूद आज भी देश की राजभाषा के रूप में हिंदी कमोबेश वहीं ठिठकी हुई है जहां यह उस दिन थी जब इसे एकमत से राजभाषा के रूप में स्वीकार करने के बाद पंद्रह वर्ष के अंदर पूर्ण रूप से अपनाने की बात कही गई थी।

Author September 14, 2018 11:46 AM
Hindi Diwas 2018: प्रतिकात्मक तस्वीर।

सरकारें जब कोई वादा एक समय सीमा के अंदर पूरा नहीं करती हैं तो उन्हें जन आक्रोश का सामना करना पड़ता है। बहरहाल, एक वादा ऐसा भी है जिसे पूरा करने के लिए आज तक कोई भी सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई। यह वादा है- हिंदी को संपूर्ण रूप से राजभाषा के पद पर आसीन करना। जनता भी इस मामले में कभी उस तरह से सक्रिय नजर नहीं आई जैसे वह समय-समय पर प्याज और टमाटर के दामों में होने वाली बढ़ोतरी के खिलाफ नजर आती है। उनहत्तर वर्ष बीतने और ग्यारह विश्व हिंदी सम्मलेन आयोजित करने के बावजूद आज भी देश की राजभाषा के रूप में हिंदी कमोबेश वहीं ठिठकी हुई है जहां यह उस दिन थी जब इसे एकमत से राजभाषा के रूप में स्वीकार करने के बाद पंद्रह वर्ष के अंदर पूर्ण रूप से अपनाने की बात कही गई थी।

ऐसा भी नहीं है कि केंद्र की विभिन्न सरकारों ने इस दिशा में कोई कदम न उठाए हों। उन्होंने गृह मंत्रालय में राजभाषा विभाग का सृजन किया। इस विभाग ने सभी मंत्रालयों में राजभाषा कार्यान्वयन समितियां बनार्इं। इसके साथ ही देश के विभिन्न शहरों में ‘नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों’ का गठन किया गया। विभिन्न सरकारी विभागों में राजभाषा अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे मंत्रालयों के कामकाज को पूर्ण रूप से हिंदी में करने के लिए समुचित कदम उठाएं। विभागों के प्रशासनिक प्रधानों को राजभाषा संबंधी नियमों के पालन के लिए उत्तरदायी बनाया गया।

बहरहाल, परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि कतिपय कारणों से कदम उठाने के बजाय अधिकांश राजभाषा अधिकारी सरकारों की नीयत भांप कर कदम उठाने के बजाय कदम-ताल करने लगे। फलस्वरूप, हिंदी केवल हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़ों तक सिमट कर रह गई। हिंदी कार्यशालाओं में कर्मचारियों और अधिकारियों को हिंदी में कार्य करने का प्रशिक्षण देने के बजाय ‘विभाग प्रमुखों’ के चहेतों के भाषण होने लगे। इनमें कई बार ऐसे मुख्य अतिथि भी बुलाए जाते हैं जो स्वयं अपना सारा सरकारी कार्य अंग्रेजी में करते हैं।
यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि सिर्फ विदेशों में शीर्ष नेताओं द्वारा यदाकदा हिंदी में भाषण देने से हिंदी को संघ के सभी कार्यों में तब तक लागू नहीं किया जा सकता है जब तक वह हर दृष्टि से समृद्ध न हो। इसके लिए जरूरी है कि हर स्तर पर हिंदी को समृद्ध करने के ठोस प्रयास किए जाएं। हमारे वैज्ञानिकों सहित विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को हिंदी को उस स्तर पर पहुंचाना होगा जिसमें इससे जुड़े सभी किंतु-परंतु शीघ्र समाप्त हो जाएं।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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