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चौपाल : काबिलियत का पैमाना

क्या इसके लिए वह शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था जिम्मेदार नहीं जो बच्चों के ज्ञान को उनकी काबिलियत से ज्यादा उनके नंबरों से आंकती है?

नई दिल्ली | June 15, 2016 7:31 AM
रूबी राय ने पॉलिटिकल साइंस को प्रोडिकल साइंस कहा था।

रूबी रॉय और सौरभ श्रेष्ठ बिहार के वे टॉपर हैं, जिनके जवाब से लोग किसी कॉमेडी शो से ज्यादा हंस रहे हैं। लेकिन क्या वाकई इन सबमें सारी गलती इनकी ही है? यह सवाल बार-बार मुझे परेशान कर रहा है। इस प्रकरण के सामने आने के बाद न केवल ये टॉपर, बल्कि समूचे राज्य यानी बिहार का मजाक बनने लगा। बिहार की शिक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे। जो हो, मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि घोटाले मीडिया में उछलने के बाद ही क्यों सरकार जागती है। दोनों टॉपर जिस कॉलेज के विद्यार्थी थे, वह 2007 से ही अपने रिजल्ट को लेकर सुर्खियों में रह चुका है। वैशाली जिले में स्थित इस स्कूल पर सरकार की नजर बहुत पहले से थी। लेकिन कड़ी निगरानी के बावजूद इस कॉलेज ने टॉपर दे दिया।

लेकिन नकल का कारोबार सिर्फ बिहार तक ही सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश जैसे कई राज्यों में नकल माफिया सक्रिय हैं। इसलिए केवल बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल पर उठाना जायज नहीं होगा। आखिर आए दिन परीक्षाओं में नकल की समस्या क्यों बढ़ती जा रही है। क्यों बच्चों के माता-पिता अधिक नंबरों के लिए कोई भी कीमत देने के लिए तैयार हैं? क्या वाकई इस टॉपर घोटाले में बच्चे, उनके माता-पिता और बच्चा राय जैसे लोग ही जिम्मेदार हैं?

क्या इसके लिए वह शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था जिम्मेदार नहीं जो बच्चों के ज्ञान को उनकी काबिलियत से ज्यादा उनके नंबरों से आंकती है? इसलिए उच्च शिक्षा के लिए अधिकतर कॉलेजों में बारहवीं के नंबरों के आधार पर ही दाखिला लिया जाता है। अगर किसी को बारहवीं में नंबर कम है तो काबिल होने के बावजूद वह अच्छे कॉलेज में पढ़ने का सपना नहीं देख सकता। शायद इसलिए भी यह नकल का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। इस देश में न जाने कितने विशुन रॉय कॉलेज और बच्चा राय जैसे लोग होंगे जो इस तरह की मेरिट-व्यवस्था का फायदा उठा रहे होंगे और काबिल बच्चे की काबिलियत नंबर के सामने शून्य हो जाते हैं!

विनीता मंडल, इलाहाबाद


क्या बदल रहा है
विकास शब्द को व्यक्ति, समाज और देश के बाहरी और आंतरिक उत्थान से जुड़ी एक सामान्य अवधारणा माना जाता रहा है। लेकिन जोर देकर दोहराए जाते रहने से ऐसा लगने लगा है कि विकास जैसे अब कोई शब्द या अवधारणा न रह कर अचानक आसमान से टपका ‘अलादीन का चिराग’ जैसा कुछ हो, जिसे लेकर इतना हो-हल्ला सुनाई पड़ रहा है। वरना विकास तो एक सतत प्रक्रिया है जो चलती आई है और चलती रहती है, विनाश की तेज आंधियों के बीच भी।

लगता है यहां ‘स्मार्ट’ शब्द ने कुछ ज्यादा ही गड़बड़ कर दी है। पिछली खामियों को दूर करने या पुरानी हो चुकी इमारत की दरारों को भरने की जगह नए मॉडल खड़े करना और उसी को अपनी देशभक्ति का मानदंड घोषित करना इस नए दौर का शगल है। ‘नई सुबह’ भी ऐसा ही नया अंदाज लेकर अवतरित हुई है। देश का प्रांगण विज्ञापनों से सजा ‘स्मार्ट’ बाजार लग रहा है, जहां ‘बदल रहा है’ और ‘आगे बढ़ रहा है’ के बोल फिजां में गूंज रहे हैं। स्क्रीन पर आत्म-मुग्ध एक छवि उभरती है जो पिछले सड़सठ बरसों से गरीबी की सताई जनता को अभय-दान की मुद्रा में तसल्ली दे रही है। हर कोने से एक ही बात मशहूर हो रही है कि दो साल में देश का कायाकल्प हो गया। तो इस तरह से भूखी-प्यासी जनता की भूख मिटाई जा रही है, प्यास बुझाई जा रही है। देश के भीतर जश्न और बाहर देश का ‘इमेज’ बनाने के लिए विदेशों की यात्राएं।

क्या देश की तिजोरी इतनी ज्यादा भर डाली?किसके लिए? या तो हम जैसों को देश-विदेश की नीतियों का या नेताओं और मीडिया की अहम जिम्मेदारियों का बोध नहीं, इसलिए ऐसी बचकाना किस्म की बातें कह जाते हैं या फिर सचमुच कुछ गंभीर सवाल हैं। मसलन, दो साल में प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर कितना पैसा खर्च हुआ होगा! क्या ये सभी यात्राएं इतनी जरूरी थीं? भूख, कुपोषण, बीमारी, खुदकुशी और सरकारी स्कूलों की दुर्दशा के मुद्दों से भी जरूरी? आकाशवाणी की बात करें तो संगीत से इतर कार्यक्रमों में काफी समय प्रधानमंत्री ही केंद्र में रहते हैं। बहुत बार राष्ट्रीय समाचारों का आधा, कभी-कभी तो तीन-चौथाई हिस्सा प्रधानमंत्री के ही इर्दगिर्द बना रहता है। यानी देश की खबरों में देश ही हाशिये पर चला जाता है। क्या यह भी ‘विकास’ के अंतर्गत आता है?

शोभना विज, पटियाला


संवेदना की कसौटी
देश के कुछ भागों में फसल बर्बाद करने के नाम पर नीलगायों की सामूहिक हत्या ने एक बार फिर मानव की क्रूरता को सामने ला दिया है। अजीब बात यह है कि केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने इसकी स्वीकृति दी है। कुछ राज्यों में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप कर इस आदेश पर रोक लगा दी है। एक तो हमने जंगल खत्म किए और अब उन जंगलों पर निर्भर जानवरों को खत्म करने पर उतारू हैं। हम क्या चाहते हैं कि सिर्फ हम ही इस धरती पर रहें। हम इतने स्वार्थी क्यों होते जा रहे हैं? जंगलों का नाश करने से लेकर जीवों की सामूहिक हत्या तक क्या हम बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं रहे?

बात अगर किसानों की फसल की बर्बादी की है तो सवाल है कि जंगलों को किसने नष्ट किया कि वे जानवर अपने पेट की आग बुझाने फसलों की ओर आ गए? उनके खाने का जिम्मा कोई सरकार उठाने वाली नहीं है, क्योंकि वे जंगल में रहते हैं। लेकिन सरकार लोगों के हित के लिए मानवीय संवेदना को दांव पर नहीं लगा सकती। फसलों की बर्बादी रोकने के लिए बाड़ लगाने से लेकर तमाम उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन जानवरों का खात्मा कर समस्या का हमेशा के लिए समाधान नहीं होगा। बदले में मानव के लिए ये भविष्य में बेहद नुकसानदेह साबित होने वाला है। और सबसे पहले यह मानवता के खिलाफ है।

विनय कुमार, लखनऊ


अपराध के ठिकाने
अगर यह कहा जाए कि सरकार में बैठे लोग और अपराधी ही सभी प्रकार के अपराधों के जन्मदाता हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी! सरकार ने अपने अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए तमाम सुविधाएं और बाजार से लड़ने के लिए उचित तनख्वाहें तय की हुई हैं, वेतन आयोग की व्यवस्था है। दूसरी ओर, इस दायरे से बाहर के साधारण लोगों की दशा किसी से छिपी नहीं है। हां, जो लोग व्यवसाय या अपराध जगत में लगे हुए हैं, उन्हें कोई असुविधा नहीं होती।

लालसिंह सोलंकी, राजस्थान विवि

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