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मजाक बनते गरीब

निस्संदेह वैश्वीकरण और उदारीकरण की आंधी में गरीब मजदूर, किसान, दस्तकार, शिल्पकार, दस्तकार आदि वर्ग भूखों मरने पर मजबूर हैं।

Author June 7, 2017 6:33 AM
सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

मजाक बनते गरीब
यह एक कटु सत्य है कि है कि मौजूदा दौर में बाजार और विचार की आपाधापी के बीच बाजार अपने पूरे कौशल के साथ सब हावी है। मुंबइया फिल्मों के सितारे सबको खाना-पीना और रहना-सहना सिखा रहे हैं। साथ ही होली, दिवाली, राखी आदि त्योहार कैसे मनाएं, यह भी चमचम करते टीवी सीरियल दिखा रहे हैं। सभी राजनीतिक दल नारों की हंडिया में वायदों की खिचड़ी बनाकर, अपनी प्यारी और भूखी-प्यासी गरीब जनता को खिलाने पर आमादा हैं।
निस्संदेह वैश्वीकरण और उदारीकरण की आंधी में गरीब मजदूर, किसान, दस्तकार, शिल्पकार, दस्तकार आदि वर्ग भूखों मरने पर मजबूर हैं। एक ओर राजधानी में वातानुकूलित कमरों में बैठे हमारे रहनुमा अपने भाषणों को आकर्षक बनाने में मशगूल रहते हैं तो दूसरी ओर राजधानी के जंतर-मंतर पर हमारे अन्नदाता अपने जीवन के लिए संघर्ष करते हैं। शायद हमारे रहनुमा होरी-हलकू की नियति को ही गरीब किसानों की नियति मान चुके हैं। यही कारण है कि टीवी चैनलों पर झलक दिखला जा, आजा नच ले, कॉमेडी सर्कस आदि जैसे कार्यक्रमों के पैरों तले हमारे अन्नदाताओं की मौत की खबरें केवल एक चलती हुई खबर-पट््टी में जगह हासिल कर पाती हैं।
’रमेश शर्मा, केशव पुरम, दिल्ली

दावों के उलट
प्रवेश विवरणिका में हिंदी भाषा-साहित्य में शोध सीटों की संख्या शून्य बताने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने एकाएक तेरह मई को नई सूचना का प्रसारण किया और एक दिन के लिए 13 सीटों पर आवेदन मांग लिए। बेहद कम समय था फिर भी ज्यादातर जगहों पर ‘नो एंट्री’ के बोर्ड से परेशान भावी शोधार्थियों ने बड़ी संख्या में फटाफट आवेदन कर दिए और जून के आखिर में होने वाली प्रवेश परीक्षा की तैयारियों में जुट गए। लेकिन यह तल्लीनता अधिक समय तक नहीं टिक सकी और महज छह दिनों बाद विश्वविद्यालयों ने सबकी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए आवेदनों को रद्द कर दिया।
इस तरह देश के एक बड़े संस्थान ने बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से छात्रों के साथ मजाक कर डाला। परीक्षा रद्द होने और आवेदन अस्वीकृत होने के दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी शुल्क के रूप में छात्रों से लिए डेढ़ हजार रुपए वापस करने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं बनाई जा सकी है। इसे क्या कहें, समझ में नहीं आता। इस अंधेरगर्दी के लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं सूझ रहा। रामराज्य और अच्छे दिन के दावे करने वाली उत्तर प्रदेश और केंद्र की सरकारों की नाक के नीचे होने वाला यह काम उनके नारों और दावों के ठीक उलट है।
’अंकित दूबे, जनेवि, नई दिल्ली

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