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जनसत्ता चौपाल : जैशा के साथ

कितना दुखद है कि ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही मैराथन धाविका ओपी जैशा अपनी दौड़ के दौरान प्यास से हलकान होकर तीन घंटे बेसुध रही।

Author नई दिल्ली | August 25, 2016 6:01 AM
रियो ओलंपिक में मैराथन रेस पूरी करने के बाद ओपी जैशा गिर पड़ी थीं। (File Photo)

कितना दुखद है कि ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही मैराथन धाविका ओपी जैशा अपनी दौड़ के दौरान प्यास से हलकान होकर तीन घंटे बेसुध रही। उसे नियत भारतीय स्टॉल पर पानी पिलाने के लिए एक भी जिम्मेदार अधिकारी या स्टाफ सदस्य तक मौजूद नहीं था। सौभाग्य से ब-मुश्किल इस धाविका की जान बच सकी। इस घटना का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि धाविका की इस आपबीती पर नैतिक जिम्मेदारी उठाने के बजाय उलटे एथेलेटिक्स फेडरेशन आॅफ इंडिया (एएफआई) ने उसे ही इस हादसे के लिए दोषी ठहरा दिया। एएफआई का कहना है कि धाविका ने ही दौड़ के दौरान पानी या एनर्जी ड्रिंक लेने से इनकार कर दिया था।

कितने दुख की बात है कि एएफआई के अधिकारियों ने अपनी गैर-जिम्मेदारी का ठीकरा एक खिलाड़ी के सिर पर सिर्फ इसलिए फोड़ दिया कि वे इस घोर लापरवाही के आरोप से अपने-आप को सुरक्षित रख सकें। अपनी चमड़ी बचाने का एएफआई का यह प्रपंच शर्मनाक है। क्या कोई धाविका, जो अपनी तमाम उम्र की मैदानी मेहनत के बाद वाजिब खेल-सुविधाओं के अभाव में भी ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व सिर्फ इसलिए कर रही है कि वह अपनी ही जान को दांव पर लगाकर एएफआई को आरोपित कर उसके खिलाफ साजिश रच सके? ये सियासी किस्म के दांव-पेच और छल-प्रपंच एएफआई के गैर-जिम्मेदार अधिकारी भले ही कर सकते हैं, मगर एक खिलाड़ी से इसकी प्रत्याशा करना बेमानी है।

सरकार को इस पहलू पर भी नए सिरे से विचार करना चाहिए कि जिन खेल-संगठनों पर वह प्रतिवर्ष करोड़ों-अरबों रुपए सिर्फ इसलिए खर्च करती है कि वे खिलाड़ियों को आवश्यक प्रशिक्षण देकर उनका बेहतर से बेहतर ‘आउट-पुट’ निकाल सकें। क्या ये खेल-संगठन अपने इस निहित-उद्देश्य को पूरा करने में सफल हो पा रहे हैं? क्या इनका अस्तित्व सिर्फ इसलिए है कि वे खिलाड़ियों का ध्यान रखने के बजाय राजनीतिक जोड़-तिकड़म के अखाड़े बन कर खुद के लिए सुख-सुविधाएं अर्जित कर सकें? क्या इन संगठनों में बैठे अधिकारीगण सिर्फ इसलिए तैनात होते हैं कि वे अपनी ही गैर-जिम्मेदारीपूर्ण लापरवाहियों का ठीकरा भी खिलाड़ियों के सिर पर फोड़ कर उन्हें बदनाम कर सकें?

आखिर ओलंपिक में खिलाड़ियों के साथ गैर-खिलाड़ियों का इतना बड़ा कुनबा भेज कर देश क्या हासिल कर पा रहा है? देखा यह जा रहा है कि जोड़-तिकड़म बैठा कर कई-एक अधिकारी और गैर-खिलाड़ी स्टाफ वहां मौज-मस्ती करने के लिए चले जाते हैं। सरकार को चाहिए कि वह जैशा मामले की मुकम्मल जांच करा कर दोषी अधिकारियों और सहायक कर्मचारियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाए ताकि देश की आन-बान और शान के लिए ओलंपिक में भाग लेने वाले मेहनती खिलाड़ियों की जान और उनके आत्म-सम्मान की रक्षा की जा सके।

राजेश सेन, अंबिकापुरी एक्सटेंशन, इंदौर


राजनीति का विषय
संसद में दलितों पर अत्याचारों के बारे में बोलते हुए गृहमंत्री ने फरमाया कि इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। ठीक कहा। कुछ मामले ऐसे होते हैं जिन पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। जैसे देश की सुरक्षा पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। आतंकवाद पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। गृहमंत्री को यह भी बताना चाहिए कि किन विषयों पर राजनीति की जा सकती है और राजनीति का वे क्या मतलब समझते हैं।

आनंद मालवीय, इलाहाबाद


बाढ़ और सुखाड़
वंदना सिंह का लेख ‘सूखे और सैलाब का हल’ (रविवारी जनसत्ता, 14 अगस्त) पढ़ा। दरअसल, सूखे और बाढ़ की समस्या से निपटना इक्कीसवीं सदी का सर्वाधिक प्रासंगिक और चिंतनीय मुद्दा है। इस पर काफी बहस हो चुकी है लेकिन आज तक हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे समय में जब वर्षा का जल नदियों में उफनाता और जन-धन को हानि पहुंचाता हुआ समुद्र में विलीन होता जा रहा है तब यह प्रश्न वाजिब हो जाता है कि क्या यह जल हमारे किसी काम नहीं आ सकता? सरकार अपना नफा-नुकसान सोच कर ही कोई कदम उठाती है।

कुछ समय पहले नदियों को जोड़ने का सपना देखा गया था लेकिन वह योजना अधर में लटक गई। हमें लगता है कि वर्तमान सरकार पूरा गणित लगाकर इस प्रश्न पर विचार करे तो उसे कतई नुकसान नहीं होगा। महज नदियों को जोड़ने की लागत न देख कर बाढ़ के समय जन-धन और मवेशियों का नुकसान, राहत पहुंचाने में किया जाने वाला खर्च, बेघरों के पुनर्वास की व्यवस्था आदि पर होने वाले व्यय को भी देखा जाना चाहिए। यह काफी न लगे तो देश में प्रतिवर्ष सूखे से होने वाले नुकसान को भी जोड़ लेना चाहिए। हर साल सूखे और बाढ़ से नष्ट हुई फसलों के मुआवजे पर व्यय की जाने वाली धनराशि भी इसमें जोड़ लें तो वह रकम नदियों को जोड़ने पर आने वाली की लागत से कई गुना ज्यादा बैठेगी। लिहाजा, नदी-जोड़ योजना फायदे का सौदा ही साबित होगी। इसके साथ ही देशवासियों को आगे आकर जल संरक्षण के बारे में पहल करनी चाहिए। नागरिकों की अदूरदर्शिता अच्छी से अच्छी योजना को विफल कर सकती है। हम सभी को इसके बारे में सचेत होना चाहिए कि भूगर्भ से अतिरिक्त जल के दोहन से बचें और जहां तक हो सके इसका अपव्यय न करें और न ही होने दें।

धर्मेंद्र प्रताप सिंह, कासरगोड, केरल


खेलों की खातिर
सरकार के महिला सशक्तीकरण के प्रयासों का फल रियो ओलंपिक में देखने को मिला। जहां दो महिला खिलाड़ियों ने पदक जीत कर भारत का खाता खोला वरना हमें खाली हाथ ही लौटना पड़ता। 117 भारतीय खिलाड़ियों में से 115 खिलाड़ी खाली हाथ लौटे जबकि पीवी सिंधु ने रजत और साक्षी ने कांस्य पदक जीता, जो बड़े गर्व की बात है। सरकार को खेलों को प्रोत्साहित करने के लिए अभी और भी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में हम इस तरह खाली हाथ न लौटें और वैश्विक स्पर्धाओं में भारत का प्रदर्शन सुधर सके।

शशि काले, दिल्ली

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