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पानी की कीमत

कुछ दशक पहले अतिवृष्टि होने पर गांव के गांव जलमग्न हो जाते थे, लेकिन वर्तमान समय में ताल-तलैया सूखते जा रहे हैं, नदियां सिकुड़ती जा रही हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो सोर्स – Indian Express

संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन 1992 में पीने के लिए स्वच्छ पेयजल के अस्तित्व के लिए जल संरक्षण के लिए कई संकल्प लिए गए, शुद्ध पेयजल के लिए कई योजनाओं के क्रियान्वयन का भी निश्चय हुआ, लेकिन इस सम्मेलन के बाद इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। संपूर्ण विश्व में पृथ्वी का इकहत्तर फीसद पानी से भरा हुआ है, फिर भी मानव समुदाय पानी के संकट से जूझ रहा है।

कुछ दशक पहले अतिवृष्टि होने पर गांव के गांव जलमग्न हो जाते थे, लेकिन वर्तमान समय में ताल-तलैया सूखते जा रहे हैं, नदियां सिकुड़ती जा रही हैं। प्रकृति तो हमें पर्याप्त जल उपयोग एवं आवश्यकता के लिए प्रदान करती है, लेकिन हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम उसे सुरक्षित नहीं कर पाते हैं। एक ओर जल प्रदूषण की समस्या है तो दूसरी ओर दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी पीने लायक पानी के संकट से जूझ रही है। खाड़ी देशों में तो यही स्थिति और भी खराब है। जल की कमी से भारतीय कृषि भी प्रभावित होती है जो मजबूत अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ है। वर्तमान समय में नदियों का स्रोत सूना होता जा रही है मानो इनका संबंध प्रकृति से विच्छेद हो गया है। नदियों की लहरों पर अठखेलियां करते पंछी भी आज उदास हो गए हैं। आसमान में भी बादल गुमसुम बैठे हुए हैं।

रेत का दोहन करते हुए लोग आज उदास हैं। अब सबसे बड़ी समस्या यह चिंता है कि पानी के बिना सृष्टि के पीत वसन के रंग को हरा कौन करेगा! नदियों की सांस रुकी-रुकी, सागर नदी के इंतजार में प्यासा, प्रकृति मौन विवश खड़ी थकी-थकी सी लगती है। हमें जल को सुरक्षित रहने के लिए दृढ़ संकल्प लेना पड़ेगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों को जल के संकट से जूझना न पड़े।
’सत्यप्रकाश सिंह, प्रयागराज, उप्र

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