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डिजिटल मीडिया की अपनी उपयोगिता है और यह कहना गलत होगा कि यह एक सार्वभौमिक रूप से बुरी चीज है, क्योंकि स्पष्ट रूप से यह हमारे जीवन में असंख्य लाभ लाता है। लेकिन यह अत्यधिक जुड़ाव आधुनिक युग के अन्य प्रलोभनों और उपभोक्तावाद में गहरे धंसाता है और पहले से मौजूद स्थितियों के आधार पर लोगों को अलग तरह से प्रभावित करता है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः unsplash)

हम हर दिन ऑनलाइन या सोशल मीडिया के मंचों पर अलग-अलग गतिविधियों में औसतन ढाई घंटे खर्च कर रहे हैं। मेरा मानना है कि सोशल मीडिया पर शायद हम इससे भी ज्यादा वक्त गुजारते हैं। सवाल है कि हमारे जीवन में इसके इतनी बड़ी भूमिका निभाने के प्रक्रिया में क्या हम अपने विकास, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण के साथ-साथ समय का भी त्याग कर रहे हैं? आमतौर पर लोग सोशल मीडिया का उपयोग हर चीज के बारे में बताने के लिए करते हैं, लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि इस पर लिखी टिप्पणियां जितना तनाव दूर करते हैं, उससे कहीं अधिक तनाव पैदा करते हैं।

केवल इंटरनेट का उपयोग करने वालों की तुलना में बीस मिनट तक सोशल मीडिया का उपयोग करने के बाद खराब मिजाज और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी महसूस की जा सकती है। अधिक मंचों का उपयोग करने वाले उपयोगकर्ता इंटरनेट की लत के परिणामस्वरूप अधिक नकारात्मक बर्ताव करते हैं और बेचैनी, चिंता, और यहां तक कि निराशा और बेकार की नकारात्मक भावनाओं को उकसाते हैं। कुछ समय पहले तक इंसान अपनी शामें कुदरती अंधेरे में गुजारता था, लेकिन अब हम दिन-रात कृत्रिम रोशनी से घिरे रहते हैं। यह आवश्यक हार्मोन के उत्पादन को रोकता है और अशांत नींद, अप्राकृतिक जैविक चक्र का कारण बनता है। लोग जितना अधिक समय व्यतीत करते हैं, बाद में उन्हें उतना ही बुरा लगता है और समय के साथ उनके जीवन की संतुष्टि उतनी ही कम होती जाती है। हमारे स्वास्थ्य पर बढ़ती गतिहीन जीवन शैली और कम भौतिक गतिविधि के हानिकारक प्रभाव भी हैं।

व्यक्ति अपने जीवन की तुलना दूसरों के अधिक सफल कॅरियर और खुशहाल रिश्तों से करते हैं। उन्हें लगता है कि उनका अपना जीवन तुलना में कम सफल है। यह लोगों को अपर्याप्त और अनाकर्षक महसूस कराता है। इसके उलट यह अहंकार और ईर्ष्या जैसे भावों को भी बढ़ावा देता है। यह हमारे ध्यान अवधि को बहुत ज्यादा नष्ट कर देता है और हमें नई जानकारी, जागरूकता और समझ के प्रति संवेदनहीन बनाता है। यह हमारे अंदर आगे बढ़ने के लिए एक आवेग को रोकने के लिए प्रशिक्षित करता है। नई जानकारी की निरंतर उपलब्धता हमारे तात्कालिक प्रभाव से आगे देखने के लिए प्रोत्साहन को कम करती है। यही मानसिक प्रशिक्षण हमारे जीवन में भी लागू होने लगती है और हम जीवन का पूर्ण और सच्चा अनुभव नहीं कर पाते। जो लोग डिजिटल उपकरणों पर सबसे अधिक समय बिताते हैं, उनके सामाजिक अलगाव और आमने-सामने शारीरिक संपर्क से दूर करने की संभावना दोगुनी है।

डिजिटल मीडिया की अपनी उपयोगिता है और यह कहना गलत होगा कि यह एक सार्वभौमिक रूप से बुरी चीज है, क्योंकि स्पष्ट रूप से यह हमारे जीवन में असंख्य लाभ लाता है। लेकिन यह अत्यधिक जुड़ाव आधुनिक युग के अन्य प्रलोभनों और उपभोक्तावाद में गहरे धंसाता है और पहले से मौजूद स्थितियों के आधार पर लोगों को अलग तरह से प्रभावित करता है।
-विनीत प्रताप, छत्तीसगढ़

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