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चौपाल: ईंधन पर कर घटे

आज तेल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, सड़क और बुनियादी ढांचे के उपकर और कृषि संस्कृति और विकास उपकर में वृद्धि कर लोगों पर भारी बोझ डाला जा रहा है।

fuel price hike, tv debateपेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर देश में बहस तेज हो गई। (फोटो- ताशी तोबग्याल इंडियन एक्सप्रेस)

देश में पेट्रोल-डीजल सहित ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं। कई जगह पेट्रोल सौ रुपए प्रति लीटर से ऊपर निकल गया है। एक समय था जब कच्चे तेल की कीमत एक सौ दस डॉलर प्रति बैरल के रूप में उच्चतम स्तर पर जा पहुंची थी और ईंधन महंगा हो गया था, तब भाजपा विपक्ष में थी और उपभोक्ताओं को बचाने के लिए सरकार को घेर रही थी। लेकिन आज जब कच्चा तेल पचपन रुपए डॉलर प्रति बैरल के आसपास है, जो 2014 की कीमत का लगभग आधा है, तो फिर देश में ईंधन इतना महंगा क्यों है और सत्ता में वही भाजपा सरकार है जो कभी महंगे ईंधन के खिलाफ धरने-प्रदर्शन करती थी।

आज तेल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, सड़क और बुनियादी ढांचे के उपकर और कृषि संस्कृति और विकास उपकर में वृद्धि कर लोगों पर भारी बोझ डाला जा रहा है। डीजल की कीमत में बढ़ोतरी कर किसानों और गरीबों को संकट में धकेला जा रहा है। ग्रामीण अंचलों में पेट्रोल से चलने वाली बाइक गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के लिए परिवहन का प्रमुख साधन है। ईंधन पर भारी कर की दरों में कमी लाकर केंद्र व राज्य सरकारें आमजन पर मेहरबानी करें।
’युगल किशोर शर्मा, खांबी, फरीदाबाद

निजीकरण क्यों
केंद्र सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, रेलवे, बीमा के साथ बैंकिंग क्षेत्र में भी निजीकरण की ओर कदम बढ़ा रही है। माना कि निजीकरण से संस्थान मुनाफे में चल सकते हैं, किंतु कल्याण का भाव कमजोर होने से गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में अपेक्षानुरूप सुधार नहीं हो पाता। उल्लेखनीय है कि गरीबों की बैंकों तक पहुंच बढा़ने के मकसद से ही बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। कमजोर बैंकों का विलय किया जाना तो एक हद तक उचित माना जा सकता है लेकिन निजीकरण के दुष्परिणाम से हम परिचित हैं।

ज्ञातव्य है कि निजी बैंकों में ग्राहकों की जमा राशि पूर्व में डूबी है तो कुछ के प्रबंध मंडल ही बैंक को चट कर गए और सहकारी बैंको में भी ऐसा ही कुछ चलने से कुछ बैंक बंद हो गए। गौरतलब है कि राष्ट्रीयकृत बैंकों पर ग्राहकों का जितना भरोसा होता है, उतना निजी बैंको पर नहीं है। फिर भी यदि राष्ट्रीयकृत बैंकों में शासन को दोष दिखते हैं तो बजाय निजीकरण के व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए।
’बीएल शर्मा”अकिंचन”, तराना, उज्जैन

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