झूठ के मंच

समाजशास्त्रियों का मानना है कि जैसे लोग अपना सामाजिक दायरा बढ़ाते हैं, उनके नजरिए में बदलाव आता है और वह दूसरों को समझना शुरू कर देते हैं। लेकिन सोशल मीडिया इस कथन के बिल्कुल विपरीत है।

सांकेतिक फोटो।

फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया से मिलने वाली सुविधाओं को बाजारों ने हमारे सामने परोसा है। यह अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, परिजनों और बचपन के बिछड़े साथियों से जुड़ने का एक जरिया है। हम जितनी आसानी से इसके जरिए संदेश पहुंचा सकते हैं, उतनी आसानी से किसी को चिट्ठी नहीं पहुंचा सकते। यह एक ऐसा मंच है, जहां लोग अपने विचार दूसरों तक पहुंचाते हैं।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि जैसे लोग अपना सामाजिक दायरा बढ़ाते हैं, उनके नजरिए में बदलाव आता है और वह दूसरों को समझना शुरू कर देते हैं। लेकिन सोशल मीडिया इस कथन के बिल्कुल विपरीत है। सोशल मीडिया ने हमेशा ही राजनीतिक नफरत को बढ़ावा दिया है, हमेशा से ही लोगों के दिमाग के साथ खेला जाता है। इसके जरिए जब किसी व्यक्ति को यह पता चलता है कि उसका परिजन, दोस्त, रिश्तेदार खुश है, तो यह बात सुनने वाले व्यक्ति को अच्छी नहीं लगती।

यहां पर दूसरे को समझने वाला कथन बिल्कुल गलत साबित होता है। यह तो बिल्कुल साफ है कि सोशल मीडिया लोगों के अंदर नफरत और बदले की भावना को बढ़ावा देता है। यह भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है।
’रिशु झा, फरीदाबाद

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