हुनर की पहचान

जिंदगी में कई बार हम खुद को कमजोर मान लेते हैं और चुनौतियों के सामने घुटने टेक देते है। अगर हम अपनी काबिलियत पर लगातार धार लगाते रहेंगे तो हमें कामयाबी जरूर मिलेगी। कहा जाता है कि कामयाबी हाथों की लकीरों में नहीं, माथे के पसीने में होती है।

chaupalअपनी प्रतिभा से अंजान लोग खुद को दोषी देते रहते हैं।

काबिलियत सभी में होती है, पर कुछ लोग अपनी काबिलियत को पहचान नहीं पाते हैं। कुछ लोग हुनर के बावजूद कामयाब नहीं हो पाते हैं, क्योंकि वे अपनी काबिलियत को तराशना भूल जाते हैं। कामयाबी हमेशा उसी को मिलती है, जो अपने हुनर को लगातार तराशता रहता है। अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखता हैं और लगातार उस दिशा में आगे बढ़ता है। चुनौतियों के सामने हताश या निराश होने वाले लोग कभी सफल नहीं होते हैं।

इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है अपनी काबिलियत को पहचानना और उसे निखारना। इस बात को एक कहानी के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। एक बार एक राजा ने एक लकड़हारे को राजकाज के काम के लिए नियुक्त किया। राजा उसके काम से काफी खुश था, क्योंकि उसने पहले ही महीने लगभग अठारह पेड़ों को काटा था। अगले महीने उस लकड़हारे ने काफी कोशिशें की, लेकिन वह केवल पंद्रह पेड़ों को ही काट पाया। तीसरे महीने उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी, लेकिन वह केवल बारह पेड़ों को ही काट पाया। धीरे-धीरे उसके पेड़ काटने की क्षमता कम होने लगी। एक दिन राजा लकड़हारे के पास पहुंचा और उससे काम में कमी का कारण पूछा। लकड़हारे ने बताया कि उसकी उम्र बढ़ रही है और शरीर में ताकत भी कम हो रही है। इसी वजह से वह ज्यादा पेड़ नहीं काट पा रहा है। यह जान कर राजा ने पूछा कि उसने अपनी कुल्हाड़ी पर कितनी बार धार लगाई और कितने दिन पहले लगाई थी?

हैरान होकर लकड़हारे ने जवाब दिया कि उसने सिर्फ एक बार ही धार लगाई थी। तब राजा ने समझाया की कुल्हाड़ी में धार न होने की वजह से उसकी उत्पादकता में कमी आ रही है। राजा ने कहा कि धार लगाओ और तुम पहले से ज्यादा लकड़ी काट पाओगे। लकड़हारा अपनी उत्पादन क्षमता के लिए खुद को दोषी मान बैठा था। वह खुद को कमजोर मान रहा था। लेकिन कमी उसकी कुल्हाड़ी में थी।

इसी तरह से जिंदगी में कई बार हम खुद को कमजोर मान लेते हैं और चुनौतियों के सामने घुटने टेक देते है। अगर हम अपनी काबिलियत पर लगातार धार लगाते रहेंगे तो हमें कामयाबी जरूर मिलेगी। कहा जाता है कि कामयाबी हाथों की लकीरों में नहीं, माथे के पसीने में होती है।
’गौतम एसआर, भोपाल, मप्र

Next Stories
1 इंसाफ का संदेश
2 नशे का जाल
3 ताक पर अवसर
ये पढ़ा क्या?
X