व्यवस्था का सवाल

यह सरकारी व्यवस्था की नाकामी नहीं है कि महामारी संकट में भी टीका कंपनियां देश में ही सरकारों से मोलभाव कर रही हैं और मोटा मुनाफा काट रही हैं और सरकार उनके साथ खड़े होकर उनके मुनाफे सुरक्षित कर रही है।

Author नई दिल्ली | Updated: May 3, 2021 2:26 AM
delhi, covidदिल्ली के एक श्मशान घाट में कोरोना मरीजों के शवों के पास खड़ा एक शख्स। (PTI Photo)

महामारी की दूसरी लहर ने देश को हिला दिया है। केंद्र और राज्य सरकारें पूरी तरह से लाचार हो चुकी हैं। अस्पतालों से लेकर श्मशानों और कब्रिस्तानों तक में जगह नहीं बची है। चौबीसों घंटे चिताओं की आग देख कर भी सरकारें जिस संवेदनहीन बनी हुई हैं, उससे जनता में आशंकाएं और गहरी होती जा रही हैं। अब तो साफ दिख रहा है कि सिर्फ डींगें हांकने के सिवाय सरकार ने महामारी से निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं की थी। जाहिर है, इससे केंद्र और राज्यों की सरकारों को लेकर लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है। जब लोग मर रहें हैं, तो प्रधानमंत्री और उनके मंत्री केवल चुनावी रैलियों में लगे रहे। ऊपर से कुंभ का आयोजन और इस आयोजन को सही साबित करने के लिए भाजपा नेताओं के कुतर्क भरे बयान सुनने को मिलते रहे। पूरा देश सरकार और प्रधानमंत्री से कठोर प्रश्न पूछ रहा है।

महामारी ने भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में व्यवस्थाओं की पोल-खोल कर रख दी है। सही में व्यवस्थाएं ध्वस्त हो गई हैं। लेकिन यह समझना पड़ेगा कि आकिर यह क्या और कौन है यह व्यवस्था और क्यों नाकाम हो रही है। कहा जा रहा है कि अस्पताल नाकाम हो गए, आॅक्सीजन प्लांट नाकाम हो गए, दवाई कंपनियां नाकाम हो गईं। हैरानी की बात तो यह है कि अब यह कुतर्क दिया जा रहा है कि जनता ही व्यवस्था होती है, उसी से व्यवस्था बनती और चलती है, इसलिए जनता फेल हो गई। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि असल में जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं, उसे हमारी निर्वाचित प्रतिनिधि और नौकरशाह ही बनाते और चलाते आए हैं। ऐसे में यह क्यों नहीं कहा जाना चाहिए कि नेताओं और नौकरशाहों की लापरवाही का खमियाजा ही जनता भुगत रही है।

क्या यह सरकारी व्यवस्था की नाकामी नहीं है कि महामारी संकट में भी टीका कंपनियां देश में ही सरकारों से मोलभाव कर रही हैं और मोटा मुनाफा काट रही हैं और सरकार उनके साथ खड़े होकर उनके मुनाफे सुरक्षित कर रही है।

इसलिए व्यवस्था की विफलता को समझना होगा। यह जनता की विफलता नहीं है। देश की जनता तो इस गले-सड़े और शोषणकारी व्यवस्था में भी मानवता को जिंदा रखे हुए है। एक दूसरे के साथ सुख-दुख में शरीक है। अगर यह साल कोरोना के कहर, सरकारों के नाकारेपन और अमानवीय वर्ताव के लिए जाना जाएगा, तो हमारे चिकित्साकर्मियों की जीवटता, बहादुरी और त्याग को भी कोई नहीं भुला पाएगा।

विक्रम सिंह, दिल्ली

Next Stories
1 टीके की कीमत
2 हाशिये पर मजदूर
3 दोहरी व्यवस्था
ये पढ़ा क्या?
X