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सवाल बनाम समाधान

नागरिकों का वह वर्ग जो सनसनी को पसंद करता है, किसी न किसी रूप में राजनीतिक समाचारों का ज्ञाता दृष्टा होता है। राजनीति में षड्यंत्र ही नहीं, रोमांच भी भरपूर होता है।

रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अरनब गोस्वामी और आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता प्रीति शर्मा मेनन।

इन दिनों आमतौर पर हर मुद्दे को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उठते सवालों का बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा। ऐसा किया तो क्यों किया, ऐसा नहीं किया तो क्यों नहीं किया? सवालों में उलझते आप और हम ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का भरपूर उपयोग होते हुए देख रहे हैं। लोकतंत्र के चलते सवाल उठाने वालों को सवाल उठाने का पूरा-पूरा अधिकार है। इस अधिकार के चलते मन के गुबार वायुमंडल में प्रविष्ट होकर विलीन हो जाते हैं। यही गुबार जब आम आदमी के मनोमस्तिष्क में बैठ जाता है- एक प्रकार से असंतोष की ज्वाला भड़का देता है। यह सिलसिला लगातार चलता है। ये अपना काम करते हैं और वे अपना काम करते हैं। बेरोजगारी के चलते हर किसी के पास समय ही समय है। राजनीति में वर्चस्व की दौड़ में सहभागी शख्सियत आपदा में भी अवसर के चलते राजनीति को ही रोजगार का अवसर माने… और नहीं तो करें भी तो करें क्या!

काम इनका भी नहीं रुकता और उनका भी नहीं रुकता। सवाल पर सवाल खड़े होते चले जाते हैं, लेकिन किसी सवाल का कभी समाधान नहीं मिलता। राजनीति में हर कोई दूसरों की लकीर छोटी करने की जुगत भिड़ा रहा है। अपनी लकीर को कोई बड़ा करना नहीं चाहता। इस प्रक्रिया में जो आरोप-प्रत्यारोप लगते और लगाए जाते हैं, इसे सक्रिय राजनीति के रूप में लिया जाता है। मीडिया तंत्र की प्राणवायु एक प्रकार से राजनीति ही होती है। सोच कर देखा जाए कि अगर राजनीतिक समाचारों के अलावा आम नागरिकों के मनोरंजन की और कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी हमारे पास नहीं है। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप के अतिरिक्त, व्यंग्य बाणों की बौछार और फिसलती जुबान के नजारे नागरिकों का भरपूर मनोरंजन करते रहे हैं।

नागरिकों का वह वर्ग जो सनसनी को पसंद करता है, किसी न किसी रूप में राजनीतिक समाचारों का ज्ञाता दृष्टा होता है। राजनीति में षड्यंत्र ही नहीं, रोमांच भी भरपूर होता है। छोटे-बड़े हर एक चुनाव में प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटाने के लिए नागरिकों की आंखों में धूल झोंक दी जाती है। वादे किए जाते हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, घोषणा की जाती है और मतदाताओं के मन की बात समझने का दंभ भरा जाता है। धनबल और बाहुबल तो अपनी जगह है, लेकिन कभी-कभी ज्योतिष एवं तांत्रिक का भी सहारा ले लिया जाता है। गरज यह कि सत्ता सुख पाने के लिए येन-केन-प्रकारेण हर उस काम को किया जाता है जो सत्ता सुंदरी के वरण के लिए आवश्यक प्रतीत होता है।
वर्तमान दौर में राजनीतिकों ने चाणक्य की चार नीतियों से कहीं आगे अनगिनत नीतियों का ईजाद कर लिया है। जो दांव में आ सके, उसे दांव में लेने के हर संभव हर कोई प्रयास कर रहा है। इन संदर्भों में लोकतंत्र की परिपक्वता के लिए सवाल निरंतर उठते रहना चाहिए, क्योंकि यही राजनीतिक जागृति का परिचायक बन गया है। सवाल दर सवाल, सवालों पर सवाल निरंतर राजनीति के बवाल को नई दिशा दे रहे हैं।
’राजेंद्र बज, हाटपीपल्या, देवास मप्र

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