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संस्कृति के गर्व

आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों मे भगोरिया पर्व आते ही वासंतिक छटा मन को मोह लेती है। एक रंग की वेशभूषा, चांदी के नख से शिख तक पहने जाने वाले आभूषण, घुंघरू पावों मे हाथों मे रंगीन रूमाल लिए गोल घेरा बनाकर मांदल व ढोल, बांसुरी की धुन पर बेहद सुंदर नृत्य करते है।

संस्कृति के गर्व
(Source: Wikimedia Commons)

देश-विदेश तक बाग क्षेत्र जिला धार का भगोरिया के नृत्य दल दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय त्योहार के अवसर पर अपनी नृत्य प्रस्तुति करते आ रहे हैं, जो प्रशंसनीय है। गोरिया नृत्य सुमधुर संगीत, वेशभूषा के साथ भगोरिया नृत्य राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है। आदिवासी दिवस, राष्ट्रीय त्योहार, विशेष पर्व पर आकर्षक प्रस्तुति देता आया है।

आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों मे भगोरिया पर्व आते ही वासंतिक छटा मन को मोह लेती है। एक रंग की वेशभूषा, चांदी के नख से शिख तक पहने जाने वाले आभूषण, घुंघरू पावों मे हाथों मे रंगीन रूमाल लिए गोल घेरा बनाकर मांदल व ढोल, बांसुरी की धुन पर बेहद सुंदर नृत्य करते है।

प्रकृति, संस्कृति, उमंग, उत्साह से भरा नृत्य का मिश्रण भगोरिया की गरिमा में वासंतिक छटा का ऐसा रंग भरता है कि देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी इस पर्व को देखने विदेशी लोग कई क्षेत्रों में आते है। दिल्ली में राष्ट्रीय पर्व पर भगोरिया पर्व की झांकी भी निकाली जाती है।

शासन द्वारा भगोरिया पर्व पर स्थानीय अवकाश भी घोषित किया जाना चाहिए। झाबुआ, आलीराजपुर, धार, खरगोन आदि जिलों के गांवों के भगोरिया पर्व लोक गीत एवं नृत्य से अपनी लोक संस्कृति को विलुप्त होने से बचाते आ रहे है। इसका हमें गर्व है।

  • संजय वर्मा ‘दृष्टि’, धार, मप्र

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