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पुलिस में सुधार

खाकी वर्दी पर दाग लगने की खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वे ही इसका मखौल उड़ाते हुए पाए जाएं।

policeसांकेतिक फोटो।

खाकी वर्दी पर दाग लगने की खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वे ही इसका मखौल उड़ाते हुए पाए जाएं। जिस प्रकार से शासन के अन्य विभागों में लापरवाही और भ्रष्टाचार का आलम होता है, उसी प्रकार से पुलिस विभाग भी इससे अछूता नहीं है। बल्कि अन्य विभागों से यहां कुछ ज्यादा ही अव्यवस्था देखने को मिलती है।

भ्रष्टाचार दूर करने के साथ-साथ नागरिकों के साथ तरीके और तहजीब से पेश आने का प्रशिक्षण पुलिस को दिया जाना जरूरी है। हो सकता है कि अचानक ही भ्रष्टाचार और कदाचरण को पूरी तरह से समाप्त करना मुश्किल हो, पर पारदर्शिता और हर कार्य की समय सीमा तय कर देने से इस पर लगाम अवश्य लगाई जा सकती है। पुलिस की सेवा शर्तों में भी सुधार की गुंजाइश है। उन्हें भी साप्ताहिक अवकाश और खुद को आराम देने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
’ललित महालकरी, इंदौर, मप्र

बेकाबू आतंक

पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सली आंदोलन कभी गरीब किसान-मजदूरों का आंदोलन होता था। लेकिन पूर्व की सरकारी नीतियों व बाबूगिरी ने इस आंदोलन को इस ऐसा नासूर बना दिया है कि आज यह भारत के लिए एक बड़ा आंतरिक खतरा बन चुका है। भोले गरीब मजदूर-किसानों को भड़का कर पहले उन्हें अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया गया, फिर जब वे बेलगाम हो गए तो उन्हें अराजक बना दिया गया।

अब स्थिति यह है कि अगर सरकारें क्षेत्र का विकास भी करना चाहें तो माओवादी संगठनों की ओर से बाधा खड़ी की जाती है। दरअसल, विकास कार्य होने पर समांतर सरकारों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि माओवादियों का मुखबिर तंत्र बहुत मजबूत है। तमाम आधुनिक संसाधन होने के बावजूद सरकारी एजेंसियों की विफलता स्पष्ट रूप से सामने आ गई है। आखिर कब तक हमारे जवान ऐसे आतंक के शिकार होते रहेंगे?
’युवराज पल्लव, मेरठ, उप्र

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