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उपेक्षित लोग

विडंबना यह है कि देश में लगभग पांच लाख से भी अधिक किन्नर होने के बावजूद इतनी बड़ी श्रमशक्ति का कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है और न ही उन्हें अपने हुनर और क्षमता को समाज में स्थापित करने का अवसर प्राप्त होता है।

सांकेतिक तस्वीर। फोटो सोर्स- Indian Express

हाल ही में छत्तीसगढ़ में पुलिस विभाग द्वारा आयोजित आरक्षक भर्ती में पंद्रह किन्नरों का चयन हुआ। यह पहली बार है जब राज्य में किन्नरों को शासकीय भर्ती में अवसर दिया गया। सरकार का यह फैसला किन्नरों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में मील का पत्थर साबित होगा। यह किसी से छिपा नहीं है कि वर्तमान में किन्नर समुदाय समाज में उपेक्षित और तिरस्कृत है। प्रकृति के क्रूर मजाक और समाज की अज्ञानता और पूर्वाग्रह के कारण ही किन्नरों का जीवन काफी संघर्षमय होता है। बचपन से पारिवारिक और सामाजिक दूरी होने कि वजह से शिक्षा के क्षेत्र में वे पिछड़ जाते हैं। न ही उनकी शादी होती है, न बच्चे। इसका दुख अलग से।

समाज में इनकी छवि और दायरे ऐसे बना दिए जाते हैं कि आमतौर पर ये विभिन्न सामाजिक उत्सवों में लोगों को लुभाने के लिए नाचते-गाते है और पैसा मांग कर अपना जीवनयापन करते हैं। दूसरे की खुशियो में शामिल होकर वे अपने जीवन में खुशियां तलाशते हैं। विडंबना यह है कि देश में लगभग पांच लाख से भी अधिक किन्नर होने के बावजूद इतनी बड़ी श्रमशक्ति का कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है और न ही उन्हें अपने हुनर और क्षमता को समाज में स्थापित करने का अवसर प्राप्त होता है। 1994 में वोट डालने का अधिकार मिलने के बावजूद कुछ राज्यों में ही इक्का-दुक्का ऐसे लोग जनप्रतिनिधि की कुर्सी तक पहुंच पाए हैं। इसमें रायगढ़ की महापौर मधु किन्नर और सुहागपुर क्षेत्र विधायक शबनम मौसी प्रमुख हैं। शासकीय महकमे में इनकी उपस्थिति नगण्य है। जबकि इनके भीतर किसी भी काम या पद के अनुकूल बेहतर काम करने की अकूत क्षमता मौजूद है। हर बार मौका मिलने पर इन्होंने साबित किया है।

आज जरूरत है कि इनके गुजर-बसर और शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए सरकार द्वारा कुछ विशेष योजनाएं चलाई जाएं। इन्हें शिक्षित कर निजी और शासकीय क्षेत्रों में कार्य करने का अवसर प्रदान किया जाए। इनके हुनर को पहचान कर ऋण उपलब्ध करा व्यवसाय करने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। साथ ही इनके लिए एक बेहतर सामाजिक माहौल सुनिश्चित करने कि जरूरत है, ताकि ये भी एक सम्मानजनक जीवन जी सकें। लोगों से अपनापा हासिल कर सकें और अपना अपनापा बांट सकें।
’अमित पांडेय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

कठघरे में तंत्र
हाल ही में एक खबर पढ़ा कि महाराष्ट्र के एक अस्पताल में एक एंबुलेंस में बाईस शवों ले जाया गया। पूछने पर प्रशासन ने बताया कि अस्पताल में केवल दो ही एंबुलेंस है और इन्हीं एंबुलेंसो से मरीज को लाना भी है और ले जाना भी है। यह कैसी स्थिति आ गई है भारत की। दरअसल, हमने सरकार से कभी यह पूछना आवश्यक नहीं समझा कि हर गांव, शहर में सरकारी अस्पताल क्यों नहीं है, कितने मरीजों पर एक डॉक्टर, नर्स और एंबुलेंस हैं। हमें तो सिर्फ इससे मतलब है कि सरकारें कहां-कहां मंदिर और मस्जिद बनवा रहीं हैं। जब बात मंदिर-मस्जिद की आती है तो हम किसी के कहने भर से मरने या मारने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन जब बात अस्पताल, स्कूल, कॉलेज की आती है तो कोई लोग यह नहीं पूछते कि सरकार ने कब बनवाने थे। इनमें पर्याप्त संख्या में डॉक्टर, नर्स, शिक्षक हैं भी या नहीं। क्या इन सबके जिम्मेदार हम खुद नहीं हैं? आखिर हम सरकार से सवाल कब पूछना शुरू करेंगे?
’रिंकू जायसवाल, गोपला, सिंगरौली, मप्र

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