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अलग-अलग भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं के बावजूद राष्ट्रीय चरित्र को अपने स्वाभाविक आचरण में आत्मसात करने के प्रति आम नागरिकों में समर्पण के भाव सदैव विद्यमान रहे हैं।

parliamentसांकेतिक फोटो।

अलग-अलग भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज और परंपराओं के बावजूद राष्ट्रीय चरित्र को अपने स्वाभाविक आचरण में आत्मसात करने के प्रति आम नागरिकों में समर्पण के भाव सदैव विद्यमान रहे हैं। राजनीतिक कारणों से क्षेत्र और भाषा के आधार पर वर्ग भेद करते हुए क्षेत्रवाद को बढ़ावा जरूर दिया गया, लेकिन आम नागरिकों की राष्ट्रवादी भावनाएं मुख्यधारा के विपरीत नहीं जा सकीं। बावजूद इसके वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर हमें और अधिक चौकन्ना रहने की नितांत आवश्यकता है। इस संदर्भ में यह अत्यधिक चिंता का विषय है कि पश्चिम बंगाल जैसे राज्य के विधानसभा चुनाव में ‘राष्ट्रीयता’ के मनोभाव को मुद्दा बनाया जा रहा है।

राजनीतिक दलों द्वारा अपने अपने प्रतिद्वंदी राजनीतिक दलों के वर्चस्व को कम करने के लिए राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि देने का अनुक्रम जारी है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा और समर्पण के भाव बौद्धिक जुगाली की विषयवस्तु बनते जा रहे हैं। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग विचारधारा के राजनीतिक दलों की सत्ता अपनी-अपनी नीतियों को क्रियान्वित कर रही है। राजनीतिक स्वार्थसिद्धि की ऐसी अंधी होड़ राष्ट्रवाद की भावनाओं को आहत करती जा रही है। किसी भी स्थिति में अहम की संतुष्टि के लिए राष्ट्र की अस्मिता को दांव पर नहीं लगाया जा सकता।

व्यक्तिकेंद्रित राजनीति सशक्त बनती जा रही है। प्रकारांतर से अनेक राज्यों में लोकतंत्र के नाम पर एकतांत्रिक व्यवस्था भी मूर्त रूप ले रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दल की सरकार होने पर केंद्र और राज्य के संबंधों में तकरार स्वाभाविक रूप से हो सकती है। लेकिन ऐसी तकरार किसी के अहं की तुष्टि के लिए होने लगे तब समस्याएं विकट होती जाती हैं। वर्तमान व्यवसायिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से विभिन्न प्रांतवासी परस्पर बेहतर तालमेल रखते हैं।

कहीं कोई पूर्वाग्रह या कटुता के भाव नहीं होते। साथ ही एक दूसरे की संस्कृति को आपस में साझा करने की उत्कंठा का परिचय भी मिलता है। परस्पर जिज्ञासु भाव के आकर्षण के चलते अलग-अलग तौर-तरीकों को सीखने और समझने का व्यापक अनुभव पाने की भावना भी बलवती होती देखी जाती है। दरअसल, जो भी कुछ अवरोध है,वह राजनीतिक स्तर पर है और यही सबसे बड़ी समस्या है।’राजेंद्र बज, हाटपीपल्या, देवास, मप्र

बेटियों का रास्ता

कभी-कभी लड़कियों की प्रतिभा के अच्छे प्रदर्शन और हौसले से भरी ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि उसके बारे जान कर सभी लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। हिमाचल प्रदेश में एक लड़की सीमा ने हिमाचल पथ परिवहन निगम में बस ड्राइवर बन कर दुनिया को यह संदेश दिया कि हमारे देश की लड़कियां कमजोर नहीं हैं। इस होनहार लड़की ने हिमाचल की सीमा को पार करके पंजाब के चंडीगढ़ तक बस दौड़ाई।

इस लड़की से उन लोगों को सबक लेना चाहिए जो अपनी बेटियों को कमजोर समझ कर या फिर संकीर्ण मानसिकता का शिकार होकर अपनी बेटियों के सपने को साकार करने में बाधा उत्पन्न करते हैं, जो बेटा-बेटी में भेदभाव करते हैं। और लड़कियों को भी चाहिए कि वे भी इस लड़की के तरह अपने हौसले बुलंद करें, अपने कॅरियर को कामयाब बनाएं, मुश्किलों से न घबराएं।

हमारे देश में आज भी बेटियों या लड़कियों के प्रति संकीर्ण मानसिकता और इन्हें कमजोर समझने वालों की कमी नहीं है, जबकि आज लड़कियां हर क्षेत्र में अपना दबदबा कायम कर रही हैं, वह क्षेत्र चाहे सेना का हो, खेल का या फिर विज्ञान का। खेलों में पीटी उषा, साक्षी मलिक, दीपा कर्मकार, दीपिका कुमारी, साइना नेहवाल, गीता फॉमेट, सानिया मिर्जा और बहुत-सी ऐसी लड़कियां हैं, जिन्होंने खेल में अपनी प्रतिभा और हुनर दिखा कर अपना और देश का नाम रोशन किया है। विज्ञान में कल्पना चावला ने शानदार प्रदर्शन कर यह दर्शाया कि अगर लड़कियों को उनकी काबिलियत और हुनर दिखाने का मौका मिले तो यह जीत का परचम लहरा सकती हैं और अपने देश, प्रदेश और मां-बाप का नाम रौशन कर सकती हैं।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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