दयनीय हालत

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की इस साल की वैश्विक लैंगिक भेदभाव रिपोर्ट में एक सौ छप्पन देशों में से भारत एक सौ चालीसवें स्थान पर खिसक गया है।

Genderसांकेतिक फोटो।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की इस साल की वैश्विक लैंगिक भेदभाव रिपोर्ट में एक सौ छप्पन देशों में से भारत एक सौ चालीसवें स्थान पर खिसक गया है। जबकि पिछले साल यह एक सौ बारहवें स्थान पर था। जाहिर है देश में लैंगिक असमानता की घटनाएं बढी हैं। दूसरी ओर आइसलैंड लगातार बारहवीं बार दुनिया में सबसे ज्यादा लैंगिक समानता वाले देश के रूप में शीर्ष पर रहा है। इसी तरह आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक रिपोर्ट में भारत की स्थिति एक सौ चौरासी देशों में एक सौ इक्कीसवें स्थान पर आई है, जबकि पिछली बार यह स्थान उनयासीवां था। इसी तरह भुखमरी हो या भ्रष्टाचार, या शिक्षी और स्वास्थ्य जैसे विषय हों, सभी में वैश्विक सूचकांकों में हमारी स्थिति दयनीय ही है।

सोचने वाली बात यह है कि यह रिपोर्ट तब आई है जब केंद्र में सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धियों की डींगे हांकते थकता नहीं है। इस रिपोर्ट का महत्त्व तब और बढ़ जाता हैं जब से भारत को तीन तलाक, महिला आरक्षण, लैंगिक सहभागिता के संदर्भो में देखा जाता है। क्या आज का भारत सिर्फ खोखले वादों के दायरों में ही सिमट कर रह गया हैं। शर्मनाक बात यह है कि एशिया में सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान ही ऐसे देश हैं जो भारत से पीछे है, बाकी सारे देश भारत से आगे हैं, यहां तक कि बांग्लादेश 65 स्थान पर है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर हम जा कहां रहे हैं? क्या हमारी लडाई पाकिस्तान और अफगानिस्तान से रह गई है? आज के समय में सरकारें सिर्फ वहीं दिखा रही हैं जो वे दिखाना चाहती हैं, जबकि हकीकत कुछ और ही है। वर्तमान में जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, वहां की गई घोषणाओं पर गौर किया जाए तो उनमें फिसलते भारत को संभालने का कोई वायदा नहीं किया गया है। कल्याणकारी नीतियों से नागरिकों के साथ राष्ट्र निर्माण किया जाता हैं, जबकि इन चुनावों के मूल में रोजगार, नवाचार, निवेश, विकास की बजाय धर्म, जाति, गोत्र, वंश ही रह गए हैं।

यह आधुनिक भारत तो नही हो सकता। इस रिपोर्ट में भी आर्थिक अवसर, शिक्षा, स्वास्थय और राजनीतिक नेतृत्व को आधार बनाया गया है। जबकि वर्तमान सरकारें धर्म और जाति से इतर कुछ नहीं चला रही। क्या इस तरह से हम चीन से टकर ले पाएंगे? क्या हम अपने आप को केवल निजीकरण से सुधार पाएंगे? क्या हम धर्म की आड़ में नाकामियां छिपाते फिरेंगे? इस तरह से तो राम राज्य नहीं आ पाएगा!
’अमर सिंह सोढा, मूलाना (जैसलमेर)

अन्याय कब तक

लोग कहते हैं कि सरकारें बदलती हैं तो बदलाव आता है। परंतु हमेशा ऐसा नहीं होता। चुनावों में पुराने दलों के ढेरों नेता नए दल के टिकट पर चुन कर आते हैं। चुनाव चिह्न बदल जाते हैं, सदन में सीटें बदल जाती हैं, किन्तु मूल चरित्र वही रहता है। बदलाव तो तब आया था जब 2019 में जेएनयू जैसी देश की शीर्ष संस्थाओं से पढ़े-लिखे लोग बड़ी संख्या में देश के सबसे कम शिक्षित राज्यों में से एक बिहार में शिक्षक बनने गए थे।

माहौल धीरे-धीरे बेहतर हो रहा था। ‘बुद्ध की प्रबुद्ध धरती’ इस आदर्श वाक्यों से इतर सच में ही प्रबुद्धता की ओर बड़े डग भर रही थी तब तक यह मामला हो गया! तिलका मांझी विश्वविद्यालय में एमए की कक्षाएं ले रहे सहायक प्रोफेसर दिव्यानंद देव पर राजद के कार्यकतार्ओं ने जानलेवा हमला कर दिया। इस घटना को कई दिन बीत चुके, लेकिन अभी तक भी राष्ट्रीय जनता दल और बिहार पुलिस हरकत में नहीं आई है। सोशल मीडिया पर तमाम बुद्धिजीवी इस घटना की निंदा और दोषियों की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं।

स्पष्ट रूप से यह दो ताकतों का टकराव है। एक ताकत उन शिक्षकों की है जो बिहार के दिमाग को चमका रहे हैं और दूसरे जो हमेशा की तरह उसे कुंदजहनी की ओर धकेलना चाहते हैं। इस संघर्ष में देश के बौद्धिक और विद्यार्थी वर्ग की पूरी तवज्जोह की दरकार होगी। इससे यह तय हो जाएगा कि जीत किसकी होगी। यदि पहली ताकत की जीत होगी तो अराजक तत्वों का मनोबल टूट जाएगा। यह समय दलगत भावनाओं से ऊपर उठ कर शिक्षा के लिए खड़े होने का समय है। यह बिहार के हक में होगा। बिहार के सभी दलों को इसके बारे में सोचना चाहिए।
’अंकित कुमार दूबे, गोविंदगंज (बिहार)

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