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हाशिये से बाहर

भारत जैसे देश में जहा परंपरा, रीति-रिवाज बहुत मायने रखते हैं, एक ऐसी जोड़ी, जो समाज के लिए ‘टैबू’ या वर्ज्य है, उनका एक साथ आना, साथ जीवन बिताना समाज के लिए अस्वीकार्य माना जाता है।

Transgenderसांकेतिक फोटो।

भारत जैसे देश में जहा परंपरा, रीति-रिवाज बहुत मायने रखते हैं, एक ऐसी जोड़ी, जो समाज के लिए ‘टैबू’ या वर्ज्य है, उनका एक साथ आना, साथ जीवन बिताना समाज के लिए अस्वीकार्य माना जाता है। आज भी समाज लड़के-लड़के या लड़की-लड़की को आपस में प्रेम करते देखता है तो उसे बहुत हीन मानता है। ऐसा इसलिए होता है कि परंपरागत रूप से उसके सोचने-समझने और मानने के लिए पुरुष-महिला की जोड़ी को ही आदर्श रूप में बताया-सिखाया गया है।

यह सदियों से चला आ रहा है। इसमें भवनाओं के लिए जगह नहीं है। लेकिन संवेदनाओं या भावनाओं के पारंपरिक परिदृश्य से इतर सोचें तब लगता है कि मानवीय लिहाज से कुछ अस्वीकार्य रही भावनाओं को स्वीकृत भावनाओं में बदलने की। यानी अगर कोई व्यक्ति परंपरागत सामाजिक व्यवहार से अलग किसी स्त्री या पुरुष को पसंद करता है और उसकी वह पसंद विपरीत लिंग के बजाय समान लिंग को रूपायित करता है, तो उसे खारिज करना ठीक नहीं है। अगर समाज को लगता है कि यह सही नहीं है तो उसे प्यार से समाज द्वारा स्वीकृत राह पर लाने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन होता यही है कि अगर ऐसा संभव नहीं हो पाता है तो उसे बेदखल कर दिया जाता है। खासतौर पर समलिंगी स्त्रियों और ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ जो होता है, उसकी खबरें आए दिन आती रहती हैं।

ऐसे जन्म तो लेते हैं समाज में स्वीकृत सामान्य जोड़ी के तौर पर विकसित होने के लिए, लेकिन थोड़े से अलग हो जाते है ‘भावनात्मक’ रूप से। उनको वह पसंद नहीं होता जो समाज की नजरों उनके लिए सही बताया जाता है। उदाहरण के लिए किसी लड़के को सजना-संवरना पसंद हो सकता है। उसे चूड़ियां पसंद हो सकती हैं, गुड़िया के खेल में रुचि संभव है। उसे अपने होठों को रंगना पसंद हो सकता है।

इसके विपरीत जब किसी लड़की को वह सब न पसंद हो, जो उनके लिए परंपरागत तौर पर सही माना जाता है, बल्कि वह सब पसंद हो सकता है जो उनके लिए समाज द्वारा तय नहीं किया गया है। यही से शुरुआत हो जाती है, उसके समाज से अलग होने की। अगर उसमें बदलाव आ जाता है, तब वह जैसे-तैसे समाज में रह लेता है। लेकिन अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं कर पाते, वे धीरे-धीरे अलग होने लगते हैं दोस्तों, रिश्तेदारों और फिर अपने परिवार से भी।

ट्रांसजेंडर समुदाय के हर एक व्यक्ति का सपना रहा होता है पढ़ना-बढ़ना, अपने परिवार के साथ रहना, लेकिन उनके साथ हालात ऐसे नहीं रहने दिए जाते। ऐसे लोगों को उनके परिवार छोड़ देते हैं, सिर्फ इसलिए कि उन्हें डर लगता था समाज में चार लोग देखेंगे-जानेंगे तो क्या बोलेंगे! अलग पसंद और पहचान वालों के प्रति ऐसा सोचने-समझने और रवैया रखने वाले लोग यह अंदाजा भी नहीं लगा पाते कि इस तरह उनके भीतर मानवीयता कितनी कम हो जाती है।
’आकांक्षा गुप्ता, दिल्ली विवि, नई दिल्ली

आग का कहर

ज्यों-ज्यों गर्मी में तापमान बढ़ता जाता है, उसी के मुताबिक हर जगह आग लगने की खबरें तेजी से आने लगती हैं। हाल ही में ऐसी ही आग लगने की एक भयानक घटना आजमगढ़ जिले में सुगड़ी तहसील के नौवरार देवारा जदीद नामक गांव से आई, जिसमें एक दो घर नहीं, बल्कि चालीस से पचास घरों वाला पूरा का पूरा गांव जल कर पूरी तरह से राख हो गए। इसमें गृहस्थी के साथ ही मवेशी तथा दो बच्चों सहित नौ लोगों के मरने की भी खबर आई।

यहां सिर्फ एक घटना की बात नहीं हो रही है, बल्कि हर साल ऐसे हजारों मामले आते हैं। एक खबर के मुताबिक साल 2020 में आग लगने के कुल 25,000 सामने आए, जिसमें तीन सौ पांच लोगों की मौत हो गई। आग लगने की घटना का कारण मुख्य रूप से बिजली के तारों की स्पार्किंग, चूल्हे की चिंगारी तथा गैस चूल्हे हैं। सुविधाओं के साथ-साथ सामानों के उपयोग को लेकर जो जागरूकता फैलाई जानी चाहिए और सावधानियां बरतनी चाहिए, उसमें कमी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप ऐसी घटनाएं होती हैं।

विचारणीय है कि जब हर साल ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं तो दमकल विभाग और संबंधित विभाग की इन परिस्थितियों से निपटने की क्या रणनीति होती है, यह पता नहीं चल पाता। इस पर सवाल उठने चाहिए। ऊपर जिस घटना की बात की गई है, ग्रामीणों के अनुसार दमकल चार घंटे बाद पहुंची, तब तक पूरा गांव जल कर राख हो चुका था। प्रशासन और सरकार को पीड़ित ग्रामीणों को उचित सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए और ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए सशक्त रणनीति बनानी चाहिए, जिसमें हर क्षेत्र में मार्च से लेकर जून तक, जब गर्मी सवार्धिक होती है, एक-दो दमकल की व्यवस्था हर वक्त तैयार रहे, ताकि आपात स्थिति में तत्काल पहुंचा जा सके।
’सत्य प्रकाश श्रीवास्तव, सुल्तानपुर, उप्र

प्रकृति के साथ

शहर से लेकर गांव तक आज धरती पर चारों ओर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गई हैं। ये गगनचुंबी इमारतें सर्वसुविधा संपन्न हैं। धरती का पेट खोद कर सिर पर लादा गया मलबा यों भले ही सुकून देता है, मगर लकड़ी से बने घरों में गोबर से लीपा फर्श फिर भी स्वास्थ्य के लिए कई गुना अनुकूल है। प्रतिस्पर्धा के दौर में लोग पैसा लगा कर भी उसका वाजिब फायदा नहीं उठा पा रहे हैं।

आज गांवों की स्थिति भी शहरों जैसी होती जा रही है। अब कच्चे मकान और टापरियों की जगह सीमेंट कंक्रीट से बने मीनारनुमा मकानों ने ले ली है, जो धरती का उदर खोद कर उसके मलबे से बने हैं। पक्के बने इन घरों में सुख-सुविधाओं से भले ही लोग संतुष्ट हैं, मगर स्वास्थ्य के लिए यह कतई अनुकूल नहीं है।

घर में ठंड दोनों मौसम की अलग-अलग व्यवस्था इन पक्के मकानों में जरूरी होती है, जबकि पुराने तरीकों से बने लकड़ी के मकान आज भी हर मौसम के अनुकूल प्रकृति के हैं। न ठंड में ठंड, न गर्मी में गर्मी। भूकंपरोधी ऐसे मकानों में जानमाल का खतरा भी ऐसे मौके पर बहुत कम रहता है। ऐसे अनुकूल मकान आज भी बनाए जा सकते हैं, बशर्तें लोगों को प्रतिस्पर्धा से दूर रहना अच्छा लगने लगे।
’अमृतलाल मारू ‘रवि’ धार, मप्र

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