क्रांति की जरूरत

डीजल, खाद और बीज की बढ़ती कीमतों से किसानों की लागत बढ़ती और उनकी आमदनी घटती जा रही है। बैंकों से जितना सहयोग मिलना चाहिए, उतना किसानों को नहीं मिल पाता। वे छोटे साहूकारों के कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं।

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कांग्रेस पार्टी बढ़ती महंगाई को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साध रही है। (फोटो सोर्स – इंडियन एक्सप्रेस)

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की साठ फीसद आबादी कृषि कार्यों पर निर्भर है। इसके बावजूद अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान महज अठारह फीसद है। आजादी के बाद से किसानों की स्थिति में सुधार लाने के लिए सभी सरकारों ने प्रयास किया, लेकिन आज भी किसानों की स्थिति दयनीय है।

डीजल, खाद और बीज की बढ़ती कीमतों से किसानों की लागत बढ़ती और उनकी आमदनी घटती जा रही है। बैंकों से जितना सहयोग मिलना चाहिए, उतना किसानों को नहीं मिल पाता। वे छोटे साहूकारों के कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं।

इसी वजह से प्रतिवर्ष अनेक किसान आत्महत्या का मार्ग चुनने को विवश हो जाते हैं। हमारे देश के किसान वैज्ञानिक उपकरणों के इस्तेमाल में अब भी पीछे हैं। अमेरिका और अन्य विकसित देशों के किसान वैज्ञानिक उपकरणों के इस्तेमाल में भारत से बहुत आगे हैं।

वर्ष 1960 में हरित क्रांति द्वारा देश में अनाज का उत्पादन बढ़ाया गया। पर एक और क्रांति की जरूरत है, जिससे किसानों की आय में बढ़ोतरी हो सके।

हिमांशु शेखर, केसपा, गया

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