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परिपक्व मतदाता

भाजपा कांग्रेस को नसीहत देने या फिर कोसने के बजाय अब अपनी पार्टी के गिरते जनाधार को मजबूत करने की ओर ध्यान दें। उसे यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि लोग किसी खास चेहरे को देख कर ही वोट देते हैं।

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव। (फोटो- पीटीआई)

उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के परिणामों ने भाजपा की जमीन हिला कर रख दी है। राज्य में ऐसी जगहों पर भी भाजपा को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा, जहां से वह देश की राष्ट्रीय राजनीति की जमीन को मजबूत करती है। अयोध्या, मथुरा, वाराणसी जैसे महत्त्वपूर्ण केंद्रों को लेकर भाजपा हमेशा जनता से वोट मांगती आई है, लेकिन पंचायत चुनाव के परिणामों ने लगता है, मंदिर-मस्जिद के मुद्दों को अब भुला दिया है। मतदाता अब सिर्फ विकास और उनके सुख-दुख में काम आने वाले नेताओं को ही बागडोर सौंपना चाहती है। लगभग आठ माह बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं।

ऐसी स्थिति में भाजपा को अब चिंतन करने की आवश्यकता है। भाजपा कांग्रेस को नसीहत देने या फिर कोसने के बजाय अब अपनी पार्टी के गिरते जनाधार को मजबूत करने की ओर ध्यान दें। उसे यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि लोग किसी खास चेहरे को देख कर ही वोट देते हैं। बंगाल और उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के परिणाम के साथ ही मध्य प्रदेश के दमोह उपचुनाव के परिणाम ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। इससे यह भी साबित होता है कि भावनात्मक मुद्दों में जनता को बहुत लंबे समय तक नहीं उलझाए रखा जा सकता है। यह अच्छा है कि जनता राजनीतिक रूप से सशक्त हो रही है और व्यापक हित के मुद्दों पर अपनी राय बना कर मतदान करने लगी है। यही लोकतंत्र का असली जीवन है।
’शिरीष सकलेचा, बड़ावदा, मप्र

कब लौटेगी जिंदगी
कुछ समय पहले एक कविता पढ़ी थी- ‘हम पंछी उन्मुक्त गगन के’, जिसमें एक पक्षी की इस व्यथा को दर्शाया गया था कि पिंजरे में बंद रह कर पक्षी अपना जीवन नहीं जी सकता, उसे खुला आसमान चाहिए। आज हम देख सकते हैं कि हमारी जिंदगी का हाल भी वही हो चुका है। लगभग तेरह महीने से भी अधिक हो गए हैं, इस मास्क और प्रतिबंधों वाली जिंदगी को जीते हुए। कोरोना से पीड़ित लोग जो दर्द झेल रहे हैं, वह सच है। लेकिन जो स्वस्थ हैं, वे भी एक मानसिक अव्यवस्था और अवसाद को झेल रहे हैं। इस घुटन से, इस अव्यवस्था से आखिर कब आजादी मिलेगी- यही प्रश्न आज बहुत सारे लोगों के मन में चल रहा है। जिंदगी को जीने के लिए मनुष्य को वह उन्मुक्त वातावरण कब मिलेगा… फिर से पहले जैसी जिंदगी कब लौटेगी..!
’स्वाति दीक्षित, मौजपुर, दिल्ली

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