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अकेलेपन का दायरा

पूर्णबंदी के पुराने दिन तो गुजर गए लगते हैं और फिर सिर पर खतरा मंडरा रहा है, लेकिन इसने वास्तविकता के धरातल पर लाकर हमें खड़ा कर दिया। वे दिन बड़े-बड़े पहाड़ों की तरह नजर आ रहे थे और रात ऐसी लगती थी, जैसे जहरीली नागिन की तरह हमें पुकारती है।

Disappointment, mental stress, social pressureमानसिक तनाव, सामाजिक दबाव या भावनात्मक टूटन से पनपी निराशा जीवन को खत्म कर रही है। (फाइल फोटो)

वैश्विक बीमारी ने तस्वीर का सच उजागर करके रख दिया है। हम अकेलेपन में तो रह सकते हैं, लेकिन अकेलेपन को बयां करना शायद संभव नहीं है। इसीलिए अकेलेपन में अकेले रह कर राज करने वाले आज एकल राजा के रूप में रहने वाले परिवार हैं, जिन्हें हम अंगुलियों पर गिन सकते हैं। उन्हें गिनने के लिए कोई समय नहीं लगेगा।

इस तरह का राज करने वाले परिवार जब हकीकत के आमने-सामने होते हैं तो अपने अकेलेपन को भूल कर अपने अतीत में जाते हैं, जहां वे भरे-पूरे परिवार के साथ रहते थे। लेकिन कहीं किसी काम, कारण के चलते अकेलेपन में रहने के लिए मजबूर हो गए। वहां दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची आदि की कमी खलती हुई नजर आ रही है। अब वे अकेलेपन को हमेशा एक शिकायत की तरह ही मानते रहते हैं। इस अकेलेपन ने पूरी तरह जिंदगी को बदल कर रख दिया। यह बात कहने में कतई संकोच नहीं है, क्योंकि इसके चलते परिवार की एक तस्वीर का सच हमारे सामने दिखाई दे रहा है।

पूर्णबंदी के पुराने दिन तो गुजर गए लगते हैं और फिर सिर पर खतरा मंडरा रहा है, लेकिन इसने वास्तविकता के धरातल पर लाकर हमें खड़ा कर दिया। वे दिन बड़े-बड़े पहाड़ों की तरह नजर आ रहे थे और रात ऐसी लगती थी, जैसे जहरीली नागिन की तरह हमें पुकारती है। ये ऐसे पल हैं, जो एकाकी जीवन को हम बोझ मान कर इसे ढो रहे हैं। इस बीमारी के कारण आज अपने अपनों के पास में नहीं है। अपने ही पराए की तरह नजर आ रहे हैं। शायद इसने हमारे कदमों को आगे बढ़ने से रोक दिया है, फिर भी अपने स्वाभिमान को जिंदा रख कर किसी की सलाह पर कोई मदद नहीं लेना स्वाभिमान को और अच्छा बना देता है।

ऐसे परिवार भी हैं जो भूखे, गरीब, असहाय लोगों की और ऐसे परिवारों के हिस्से की मदद लेना नहीं चाहते हैं। यह भी एक तस्वीर का सच है। पूर्णबंदी के चलते कई सामाजिक संस्थाओं ने अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए कहीं भोजन, दवाई, आने-जाने की व्यवस्था के साथ गोपनीय रूप से भी आर्थिक मदद की है। मगर कहीं न कहीं अपने स्वाभिमान को सर्वोपरि रखते हुए बहुत सारे लोगों ने संघर्ष को अकेलेपन में रह कर लड़ा है। इससे एक बात उभर कर सामने आई कि हमारा संघर्ष ऐसे संघर्ष की तरह है, जो आज नहीं तो कल, हमारे संघर्ष का इतिहास जरूर बताएगा।
’प्रकाश हेमावत, रतलाम, मप्र

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