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जलवायु का जीवन

सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का गठन किया गया था। हर वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस के लिए एक नारा निर्धारित किया जाता है। इस बार इस दिन को मनाने के लिए वर्ष 2021 के लिए ‘पारिस्थितिकी तंत्र बहाली’ निर्धारित किया गया है।

विकास के दौर में पर्यावरण के साथ इंसानी खिलवाड़ ने विनाश के रास्ते भी खोल दिए हैं।

कोरोना महामारी के दौरान लगी बंदिशों से जीवन की रफ्तार थोड़ी धीमी जरूर हुई है, लेकिन इससे प्रकृति की समृद्ध विविधता जैव-विविधता को करीब से देखने का अवसर भी मिला है। कितने ही ऐसे पक्षी जो प्रदूषण और शोर-शराबे में ओझल हो गए थे, सालों बाद उनकी आवाज को लोग अपने घरों में सुनने लगे। अनेक जगहों से जानवरों के उन्मुक्त विचरण की खबरें आई, निर्मल गंगा से लेकर झाग से भरी काली यमुना का पानी-नीला दिखने लगा था। इस तरह की अनेक सकारात्मक घटनाएं हमें इस महामारी के दौरान देखने को मिली हैं।

पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन लोगों को जागरूक करने के लिए कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के जरिये लोगों को पेड़-पौधे लगाने, पेड़ों को संरक्षित करने, हरे पेड़ न काटने, नदियों को साफ रखने और प्रकृति से खिलवाड़ न करने जैसी चीजों के लिए जागरूक किया जाता है। वैसे तो विश्व पर्यावरण दिवस वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया गया था, लेकिन विश्व स्तर पर इसके मनाने की शुरुआत 5 जून 1974 को स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुई थी, जहां इस दिन पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन किया गया था और इसमें 119 देशों ने भाग लिया था।

इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का गठन किया गया था। हर वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस के लिए एक नारा निर्धारित किया जाता है। इस बार इस दिन को मनाने के लिए वर्ष 2021 के लिए ‘पारिस्थितिकी तंत्र बहाली’ निर्धारित किया गया है। पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर पेड़-पौधे लगाना, बागों को तैयार करना और उनको संरक्षित करना, नदियों की सफाई करना जैसे कई तरीकों से काम किया जा सकता है।

वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण प्रमुख वैश्विक समस्याओं में से एक है। जलवायु परिवर्तन, भू-क्षरण और पानी के लगातार दोहन की वजह से पूरे विश्व का एक बड़ा हिस्सा आज सूखे से जूझ रहा है। हरे-भरे जंगल आज मरुस्थल में तब्दील हो रहे हैं। इसके लिए बेहद जरूरी है कि पर्यावरण को लेकर सबसे पहले हमें अपनी सोच पर काम करना चाहिए। हमें प्रकृति के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आदिवासियों, किसानों और अन्य संरक्षकों की बेहतरी के बारे में सोचना होगा।

यह सच है कि जंगल के बिना इस धरती की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। हमारा जीवन सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ा हुआ है, पर जिस तेजी से हम जंगलों की कटाई कर रहे हैं। इसका भुगतान भी हमको ही करना पड़ रहा है। ओजोन परत भी लगातार सिकुड़ रही है। शुद्ध वायु और शुद्ध जल के लिए हम तरस रहे हैं।

ये समस्याएं भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण विश्व में चिंता का कारण बनी हुई हैं। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में ये चुनौतियां और भी गंभीर हो जाती हैं। पर अगर हम इसकी गंभीरता को समझें तो हम आधुनिकता के साथ प्रकृति का संतुलन बनाने में कामयाब हो सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कड़े फैसले लेकर आने वाली नस्लों को जीवनदान दे सकते हैं। समय की मांग है कि प्राकृतिक संपदा के दोहन पर तुरंत अंकुश लगे। साथ ही सभी देशवासियों की जिम्मेदारी है कि वह प्रकृति को फिर संवारने में अपना अहम योगदान दें।

-गौतम एसआर, भोपाल, मप्र

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