न्याय के लिए

यह देखकर आश्चर्य होता है कि एक तरफ न्यायालय सरकार को उसके कर्तव्यों को बार-बार याद दिलाती रहती है। लेकिन सरकार का अड़ियल रुख देख कर लगता है कि उसके कानों पर जू तक नहीं रेंगती है।

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जस्टिस एनवी रमना। फोटो: इंडियन एक्सप्रेस

‘न्याय की गति’ (संपादकीय, 6 सितंबर) पढ़ा। खबर के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए आदेश दिया था कि वह शीघ्र न्यायाधिकरणों में नियुक्ति करे। यह समझना मुश्किल है कि हमारे अर्ध-न्यायिक संस्थाओं में अधिकारियों के पद दो साल से खाली पड़े हैं और केंद्र सरकार उन पर नियुक्ति क्यों कर नहीं रही है। प्रधान न्यायाधीश ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इन संस्थाओं में खाली पदों पर नियुक्ति न करके सरकार इन्हें शक्तिहीन बना रही है।

न्यायाधीश ने कहा कि सरकार अदालत का जरा भी आदर नहीं करती और चेतावनी दी कि सरकार न्यायालय के धैर्य का इम्तिहान न लें। इसके अलावा, सॉलिसीटर जनरल के सामने सरकार को तीन विकल्प दिए। एक न्यायाधिकरण सुधार कानून पर रोक और नियुक्ति करना। दूसरा, अदालत न्यायाधिकरणों पर ताला लगा दे। तीसरा विकल्प यह कि न्यायालय खुद खाली पदों पर नियुक्ति करे।

सवाल है कि क्या सरकार की कार्यशैली पर इससे ज्यादा तीखी टिप्पणी कुछ और हो सकती है? यह देखकर आश्चर्य होता है कि एक तरफ न्यायालय सरकार को उसके कर्तव्यों को बार-बार याद दिलाती रहती है। लेकिन सरकार का अड़ियल रुख देख कर लगता है कि उसके कानों पर जू तक नहीं रेंगती है। न्यायालय का चिंतित होना विचारणीय है, क्योंकि न्यायाधिकरण अर्ध-न्यायिक संस्थाएं हैं और इनके कार्य अति आवश्यक होते हैं। ये न्याय-प्रक्रिया की सहायक संस्थाओं के रूप में काम करते हैं और अदालतों के कामकाज को आसान बनाते हैं।
’रिंकू जायसवाल, सिंगरौली, मप्र

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