किसानों की आय

भारत में किसान को अन्नदाता कहा जाता है, पर वास्तविकता कुछ और है। देश में जहां किसान की मासिक आय मात्र छह हजार रुपए के आसपास है, दूसरी ओर इसी देश में सातवां वेतनमान लेकर मोटा वेतन उठाने वालों की तादाद भी लाखों में है।

खेत में किटाणुनाशक का छिड़काव करते किसान। फाइल फोटो।

तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के सरकार के फैसले को समर्थक और विपक्षी इसे अपनी-अपनी जीत बता रहे हैं। कोई इसे गहरी चाल कह रहा है तो कोई इसे आगामी चुनावों में हार का डर बता रहा है। पर सच तो यह है कि ये तीनों कृषि कानून इतने जटिल हैं कि अब भी लोगों के समझ से बाहर हैं। सरकार इन कानूनों को जनसामान्य तक ले जा पाने और इस बारे में समझा पाने में पूरी तरह नाकाम रही।

विपक्ष ने भी इसे पूरी तरह समझाने की जगह उलझाने और आंदोलन बनाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई। खैर कोई कानून अगर देश और जनता के हित में न हो तो उसे वापस ले लेने में समझदारी है। पर सवाल यह है कि जब इसे वापस लेना ही था, तो फिर इतनी देरी क्यों? देश ने इस आंदोलन के नाम पर क्या कुछ नहीं देखा और सहा। किसने सोचा था कि कभी कोई लाल किले से तिरंगा हटाएगा।

यह तस्वीर लोग नहीं भूल सकते और न ही विदेशों में हुई देश की किरकिरी को। सरकार के इस फैसले से कौन जीता या कौन हारा, इससे ऊपर उठ कर अगर हम यह सोचें कि अगर इस फैसले से सच में किसानों की जीत हुई है तो उनकी स्थिति सुधरेगी, उनकी आय बढ़ेगी तो यह वाकई में काबिले तारीफ कदम होगा।

भारत में किसान को अन्नदाता कहा जाता है, पर वास्तविकता कुछ और है। देश में जहां किसान की मासिक आय मात्र छह हजार रुपए के आसपास है, दूसरी ओर इसी देश में सातवां वेतनमान लेकर मोटा वेतन उठाने वालों की तादाद भी लाखों में है। सवाल है कि यह असमानता कब खत्म होगी? गौरतलब है कि सरकार ने 2013 के बाद किसानों की वास्तविक आय से संबंधित सर्वे दिखाना बंद कर दिया।

नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) ने 2012-13 में अंतिम कृषक आय का सर्वे किया था। एक तरफ तो 2022 तक किसानों की आय दुगनी कर देने का दावा किया जाता है, दूसरी ओर धरातल पर ऐसा कुछ होता दिखता नहीं। खैर चुनाव सर पर हैं तो ऐसे और न जाने कितने निर्णय आएंगे और पलटे जाएंगे। अब समर्थकों और विरोधी दोनों को होशियार रहना होगा कि कब कौनसा कानून रद्द होगा और कौन किसके साथ होगा कोई पता नहीं।
’देवानंद राय, दिल्ली

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